Thursday, April 14, 2022

 

ये दशक उत्तराखंड का दशक है ! – नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री की इस घोषणा को मूर्त रूप देने हेतु मानस खंड (कुमायूं) के चार धाम परिभाषित हों !!

स्कन्द पुराण में वर्णित केदारखंड (गढ़वाल) में अवतरित  केदारनाथ  धाम का पुनरुद्धार करने व चारों धाम – बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री व गंगोत्री को आल वैदर रोड से जोड़ने की योजना के पश्चात मानस खंड (कुमायूं) के लिए राज्यपाल लैफ्टिनेंट जर्नल गुरमीत सिंह (सेवा निवृत) ने विधान सभा  में अपने अभिभाषण में  कुमायूं के प्राचीन मंदिरों को भव्य बनाने के लिए मानस खंड मंदिर माला मिशन की घोषणा की है ! राज्यपाल व सरकार का यह संकल्प प्रसंसनीय है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए ! सरकार के इस कदम से कुमायूं को भी एक तीर्थ स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकेगा !

देव भूमि गढ़वाल में प्राचीन मंदिरों की लम्बी श्रंखला है ! वहाँ केदारनाथ धाम है, बद्रीनाथ धाम है, गगोत्री धाम है, यमुनोत्री धाम है, गढ़वाल में ही हरिद्वार है व  ऋषिकेश भी है ! परन्तु देखा जाय तो कुमायूं क्षेत्र में मंदिर तो बहुत हैं, पर वह धामकी श्रेणी का कोई मंदिर नहीं है !

कुमायूं में पर्यटन को विकसित करने हेतु आवश्यकीय है धार्मिक पर्यटन को कुमायूं से भी जोड़ा जाय ! पर्यटक हरिद्वार, ऋषिकेश व  चार धामों की यात्रा कर वापस गढ़वाल के मार्ग से ही वापस चला जाते है !                                                                   मानस खंड मंदिर माला मिशन के प्रारंभ होने के साथ ही पर्यटक कुमायूं के मंदिरों व अन्य पर्यटक स्थलों में प्रवास कर ही गन्तव्य स्थान को जायेंगे  ! ऐसी अपेक्षा की जा सकती है ! इससे कुमायूं का पर्यटन व खास तौर पर धार्मिक पर्यटन का कारोबार बढ़ेगा ! कुमायूं में जागेश्वर धाम  12 ज्योतिर्लंगों में 8वां ज्योतिर्लिंग  है तथा पांचवे धाम के रूप में प्रसिद्द है !  बाघ नाथ धाम है, कैंची धाम हैबैजनाथ धाम हैबग्वाल युद्ध के लिए मशहूर देवीधुरा धाम है ! दूनागिरी मंदिर है, परन्तु इन्हें धाम की मान्यता प्राप्त नहीं है ! इसी प्रकार पुरातात्विक रूप से , द्वाराहाट के 55 मंदिरों समूह जिनका निर्माण 10 से 12 सदी के बीच में किया था दर्शनीय हैं र्यटन के लिए कुमायूं में  कटारमल सूर्य मंदिर है, कौसानी में विश्व प्रसिद्द अनाशक्ति आश्रम है, पहाड़ों की रानी नैनीताल जैसा आधुनिक शहर है, रानीखेत जैसा खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां से 360 किलोमीटर लम्बी हिमालय श्रंखला के दर्शन होते हैं !

भारत में कुल 4 धाम हैं – बद्रीनाथ धाम, रामेश्वर धाम, जगन्नाथ पूरी, व द्वारका !  इन मंदिरों को 8वीं शदी में आदि शंकराचार्य ने एक सूत्र में पिरोया था ।

बीसवीं शताब्दि के मध्‍य में हिमालय की गोद में बसे इन चारों तीर्थस्‍थलों  बद्रीनाथ  को छोड़ कर केदारनाथ , यमुनोत्री एवं गंगोत्री को ‘छोटा' विशेषण दिया गया जो आज भी यहां बसे इन देवस्‍थानों को परिभाषित करते हैं । 

प्रश्न है कि कैसे चार धाम यात्रियों को मानस खंड की ओर आकर्षित किया जाय ? चार धाम यात्री हरिद्वार, ऋषिकेश होते हुए चार धामों के दर्शन कर वापस लौट जाते हैं ! कुमायूं में एक भी धाम नहीं है, इसलिए आवश्यकीय है कि कुमायूं के प्राचीन मंदिरों को ‘धाम’ कि मान्यता मिले !                                                                           जिस प्रकार बीसवीं शताब्दि के मध्‍य में इन चारों तीर्थ स्‍थलों, बद्रीनाथ को छोड़ कर केदारनाथ , यमुनोत्री एवं गंगोत्री को ‘छोटा' विशेषण दिया गया था उसी प्रकार चार या अधिक महत्वपूर्ण मंदिरों  को ‘छोटा धाम’ का विशेषण दिया जा सकता है !                                                                                                                            प्रशन्नता है कि 22 अगस्त, 2022 को तत्कालीन राज्यपाल डॉ केके पॉल ने हमें राह दिखलाई है ! उन्होंने विश्व के सबसे बड़े श्रीयंत्रकी स्थापना के अवसर पर घोषणा की थी कि विश्व प्रसिद्द कल्यानिका कनरा डोल आश्रम को  उत्तराखंड के पांचवे धाम के रूप में पहिचाना जाएगा !                                                                                                    

इस प्रकार राज्यपाल महोदय ने धाम की मान्यता देने का श्रीगणेश कर दिया है ! इसलिए मानस खंड (कुमायूं ) में भी अधिकतम चार ‘छोटा’ धामों की मान्यता दी जा सकती है ! धार्मिक पर्यटक केदारखंड (गढ़वाल) में चार धाम मंदिरों के दर्शन कर मानस खंड (कुमायूं)  में नए चार धामों – पूर्व राज्यपाल द्वारा घोषित ‘धाम’ कल्यानिका कनरा डोल आश्रम, के अतिरिक्त  8वें ज्योतिर्लिंग जागनाथ धाम जो धाम के रूप में प्रसिद्ध है व  बागनाथ धाम आदि  के दर्शन के इच्छुक होंगे !                                                                    इस हेतु पर्यटन विभाग धार्मिक पर्यटन यात्रियों को विस्तृत जानकारी दे सकता है ! इसमें राज्य सरकार व केंद्र सरकारं  का योगदान महत्वपूर्ण  रहेगा                                                                                                                                                  



अतः इस विषय को लेकर आगे बढ़ा  जाय  तो कुमायूं में भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, इसमें संदेह नहीं  !
                                                                        

डीएन बड़ोला, DN Barola  प्रेसिडेंट,  प्रेस क्लब, बड़ोला कॉटेज, रानीखेत  ! Mob.9412909980 

 

Thursday, March 31, 2022

 मानस खंड मंदिर माला मिशन ( कनरा डोल आश्रम को ‘धाम’ की मान्यता )

राज्यपाल लैफ्टिनेंट जर्नल गुरमीत सिंह (सेवा निवृत) ने विधान सभा में अपने अभिभाषण में कहा कुमायूं के प्राचीन मंदिरों को भव्य बनाने के लिए मानस खंड मंदिर माला मिशन की शुरूवात होगी !
राज्यपाल व सरकार का यह संकल्प प्रसंसनीय है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए ! सरकार के इस कदम से कुमायूं को भी एक तीर्थ स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकेगा ! देव भूमि गढ़वाल में प्राचीन मंदिरों की श्रंखला है ! वहाँ केदारनाथ धाम है, बद्रीनाथ धाम है, गगोत्री धाम है, यमुनोत्री धाम है, गढ़वाल में ही हरिद्वार है व ऋषिकेश भी है ! परन्तु देखा जाय तो कुमायूं क्षेत्र में मंदिर तो बहुत हैं, पर वह ‘धाम’ की श्रेणी में नहीं आते !
कुमायूं में पर्यटन को विकसित करने हेतु आवश्यकीय है धार्मिक पर्यटन को कुमायूं से जोड़ा जाय ! पर्यटक हरिद्वार, ऋषिकेश व चार धामों की यात्रा कर वापस गढ़वाल के मार्ग से ही वापस चला जाते है ! मानस खंड मंदिर माला मिशन के प्रारंभ होने के साथ ही पर्यटक कुमायूं के मंदिरों व अन्य पर्यटक स्थलों में प्रवास कर वापस जाएगा ! इससे कुमायूं का पर्यटन कारोबार बढ़ेगा ! कुमायूं में जागेश्वर धाम है, बाघ नाथ धाम है, कैंची धाम है, बैजनाथ धाम है, बग्वाल युद्ध के लिए मशहूर देवीधुरा धाम है ! दूनागिरी मंदिर है, परन्तु इन्हें धाम की मान्यता प्राप्त नहीं है! पर्यटन के लिए कुमायूं में कटारमल सूर्य मंदिर है, कौसानी में विश्व प्रसिद्द अनाशक्ति आश्रम है, पहाड़ों की रानी नैनीताल जैसा आधुनिक शहर है, रानीखेत जैसा खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां से 360 किलोमीटर लम्बी हिमालय श्रंखला के दर्शन होते हैं !
कल्यानिका कनरा डोल आश्रम को ‘धाम’ की मान्यता : विश्व के सबसे बड़े व सबसे भारी श्रीयंत्र की स्थापना के अवसर पर तत्कालीन राज्यपाल डॉ०के के पॉल ने दिनांक 24 अगस्त, 2022 को घोषणा की थी कि कल्यानिका कनरा डोल आश्रम को पांचवे धाम की मान्यता दी जायेगी ! यह मान्यता अब नई सरकार को शीघ्र देनी चाहिए ! डोल आश्रम कनरा की खासियत यह हैं कि यहां पर 126 फुट ऊंचे तथा 150 मीटर व्यास के श्रीपीठम का निर्माण हुआ है। इस श्रीपीठम में एक अष्ट धातु से निर्मित लगभग डेढ़ टन (150 कुंतल) वजन और साढ़े तीन फुट ऊंचे श्रीयंत्र की स्थापना आध्यात्मिक आस्था को एक साथ जोड़ने के लिए की गई है । श्री पीठम में लगभग 500 लोग एक साथ बैठ कर ध्यान लगा सकते हैं ।
इसी गाँव कनरा में 1,000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित सड़क मार्ग से जुड़ा शिव लिंग, ‘शिव जिव्हा’ के रूप में स्थापित है ! इस शिव लिंग में अर्पित जल चमत्कारिक रूप से अलोप हो जाता है ! आशा है सरकार अपने उपर्युक्त संकल्प को पूरा करने का कार्य करेगी, जिससे कि कुमायूं क्षेत्र के पर्वतीय अंचल में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलो सके !
डीएन बड़ोला, अध्यक्ष, प्रेस क्लब, रानीखेत
9412909980
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Sunday, April 21, 2019

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यौन शोषण का आरोप एवं घरेलू हिंसा कानून !
विचित्र किन्तु सत्य है सती अनुसुइया, सती सीता व सावित्री के देश मैं 1860 में बने कानून के अनुसार एक पत्नी द्वारा ब्याभिचार कानून सम्मत है ! परंतु पति द्वारा किया गया ब्याभिचार गैर कानूनी है तथा ऐसे व्यक्ति को व्यभिचार करने पर इंडियन पेनल कोड के सेक्शन 497 के अनुसार पांच साल तक की सजा के साथ ही जुर्मना भी हो सकता है ! 158 वर्ष पुराने इस लिंग भेदी कानून को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने एकमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया है ! सुप्रीम कोर्ट ने कहा है यह संविधान के आर्टिकल 21 जीवन जीने की आजादी व निजता के अधिकार (Right to life and personal liberty) तथा आर्टिकल 14 समानता के अधिकार का उलंघन करता है ! सुप्रीम कोर्ट का इस निर्णय का स्वागत है !
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यौन शोषण के बाद जो स्थितियां आई हैं उनसे स्पष्ट है एक महिला किसी भी व्यक्ति चाहे वह सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस ही क्यों न हो यौन शोषण के आरोप लगाकर उसकी इज्जत पर भयंकर हमला कर सकती है ! महिला के खिलाफ अपराधों के हर केस में पुरुष को प्रारम्भ से ही दोषी समझा जाता है ! सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के ऊपर आरोपों के बाद क्या अब देश के प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति की ऊपर भी कोई महिला यौन शोषण का आरोप लगा सकती है ? इसकी कल्पना करना ही सिहरन पैदा कर देता है !
यह ठीक है कि महिला के अधिकारों की रक्षा की जानी जानी चाहिए, पर क्या पुरुषों के अधिकारों की रक्षा नहीं की जानी चाहिए ? शादी एक सिविल समझौता है ! इसलिए इसके अन्दर शिकायतों का निराकारण सिविल केस के ही तरह क्यों नहीं हो सकता ? तीन तलाक के मामले मैं सरकार इसे क्रिमिनल केस के तौर पर लेना चाहती है, जबकि विरोधी पक्ष इसे सिविल केस के तौर पर बनाए जाने की बात कहती है !
शादी के बाद पति पत्नी के बीच एक और कानून है जो आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! लिंग भेद करने वाली धारा 498-A पति द्वारा पत्नी के ऊपर उत्पीड़न को गैर कानूनी मानती है तथा इसमें सजा का प्राविधान है ! परन्तु यदि पत्नी, पति का उत्पीड़न करती है तो इसे कानून सम्मत माना जाता है ! जबसे यह कानून लागू किया गया है तबसे ही बताया जाता है कि कुछ पत्नियों ने इसे रूपया कमाने का हथियार बना दिया है ! कानून के लागू होने के प्रारंभ में 2,000 किलोमीटर दूर रहने वाले माता पिता, भाई बहिन व नजदीकी रिश्तेदारों को भी जेलों में ठूंस दिया गया ! इसमें किसी तरह की कोई कानूनी रियायत नहीं दी जाती थी !
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून में कुछ सुधार किया गया ! परन्तु अधिकाँश मामलों में पति को तो जेल जाना ही पड़ता है ! इन मामलों में निर्दोष पति की फ़रियाद कोई नहीं सुनता, साथ में उसकी छबि भी एक बदमाश की तरह पेस की जाती है ! पत्नी पति को जेल भी भेज देती है और ऊपर से गुजारा भत्ते की मांग भी करती है ! तलाक मांगने पर एक मुस्त एक मोटी रकम एलिमनी के रूप मैं देनी होती है ! इसके अतिरिक्त पत्नी को मुकदमे का खर्चा भी पति को देना पड़ता है ! मुक़दमा जहां पत्नी रहती है वहीं पर किया जाने का प्रविधान है ! पति को पहले से ही अपराधी समझा जाता है ! पत्नी को पीड़ित मानकर दोषी या निर्दोष पति को पत्नी जेल की हवा खिला कर खुद को गौरवान्वित महसूस करती है ! इस कारण समाज मैं आज के के कई नवजवान शादी करने से भी कतराने लगे है !
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के अनुसार 7 मामलों मैं से केवल एक मामले मैं ही सजा दी जा सकी है अर्थात 7 में से 6 मामले फर्जी होते है ! वैसे तो गलत मुक़दमा करने पर सजा का भी प्राविधान है परन्तु कोर्ट की मानहानि के मामले में मुकदमे का फैसला होने के बाद ही मानहानि (Perjury) का मुक़दमा किया जा सकता है ! फैसला आने के पहले नहीं ! इस कारण फर्जी मुकदमा साबित होने व पति के बाइज्जत रिहा होने के बावजूद पत्नी को किसी तरह की कोई सजा नहीं होती !
निर्दोष पतियों की फ़रियाद कहीं भी नहीं सुनी जाती ! अनेक मामलों में पति की नौकरी छूट जाती है ! ऐसे मैं उसे गुजारे भत्ते का भी भुगतान पत्नी को करना पड़ता है, यदि वह गुजारा भत्ता नहीं दे पाता है तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है ! यदि पति, पत्नी को तलाक देता है तो काउंटर ब्लास्ट कर पत्नी तुरंत 498-A के अंतर्गत मुक़दमा दायर कर पति को समझौता करने को बाध्य कर देती है, यदि पति तलाक वापस नहीं लेता तो उसे जेल जाना पड़ता है !
यह पहले से ही मान लिया जाता है कि उत्पीड़न केवल पति ही करता है, पत्नी कभी भी नहीं जबकि यह सच नहीं है l सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि पुरुष भी महिला उत्पीड़न के शिकार होते है ! भारत मैं पुरुषों को पत्नियों द्वारा उत्पीड़न से बचाने हेतु Men’s Right Movement कार्य कर रहा है l यह पुरुषों को कानूनी सहायता देता है l इसकी मांग है कि महिला आयोग की तरह पतियों की मदद हेतु पुरुष योग भी गठित किया जाना चाहिए ! यह कानून केवल पत्नियों को संरक्षण देता है पति को नहीं ! पति के लिए पत्नी की शर्तों पर समझौता या जेल ही विकल्प होता है !
(1) यह एक तरफा लिंग भेद करने वाला कानून है अतः यह आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए या (2) पत्नी के द्वारा पति के उत्पीड़न पर पति को भी अधिकार होना चहिये कि वह 498-A के अंतर्गत पत्नी के खिलाफ मुक़दमा कर सके या फिर इसे सिविल केस की तरह माना जाना चाहिए ! इससे परिवारों की रक्षा हो सकेगी !
इसी प्रकार एक और प्राविधान दहेज के विषय में है ! दहेज़ एक्ट के अनुसार दहेज़ देना और लेना दोनों ही अपराध है जैसे घूस देना और लेना दोनों ही अपराध है ! लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार दहेज़ देने अपराध नहीं है ! सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार दहेज़ देने वाला व्यक्ति पीड़ित है ! इसलिए इसे अपराध नहीं माना जा सकता ! इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट फैसला एक्ट के प्राविधान को ही बदल देता है ! जिस पर नई परिस्थितयों में पुनर्विचार होना चाहिए !                                 (लेखक : डीएन बड़ोला, अध्यक्ष, प्रेस क्लब, रानीखेत )

Tuesday, October 2, 2018

व्यभिचार (Adultery) की धारा 497 के निरस्त होने के बाद घरेलू हिंसा कानून 498-A क्यों ?


व्यभिचार की धारा 497 के निरस्त होने के बाद घरेलू हिंसा कानून 498-A क्यों ?
विचित्र किन्तु सत्य है सती अनुसुइया, सती सीता व सावित्री के देश मैं 1860 में बने कानून के अनुसार एक पत्नी द्वारा ब्यभिचार कानून सम्मत है ! परंतु पति द्वारा किया गया व्यभिचार गैर कानूनी है तथा ऐसे व्यक्ति को व्यभिचार करने पर इंडियन पेनल कोड के सेक्शन 497 के अनुसार पांच साल तक की सजा के साथ ही जुर्मना भी हो सकता है ! 158 वर्ष पुराने इस लिंग भेदी कानून को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने एकमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया है ! सुप्रीम कोर्ट ने कहा है यह संविधान के आर्टिकल 21 जीवन जीने की आजादी व निजता के अधिकार (Right to life and personal liberty) तथा आर्टिकल 14 समानता के अधिकार का उलंघन करता है ! सुप्रीम कोर्ट का इस निर्णय का स्वागत है !
शादी के बाद पति पत्नी के बीच एक और कानून है जो आर्टिकल 21 14 का उलंघन करता है ! लिंग भेद करने वाली धारा 498-A पति द्वारा पत्नी के ऊपर उत्पीड़न को गैर कानूनी मानती है तथा इसमें सजा का प्राविधान है ! परन्तु यदि पत्नी, पति का उत्पीड़न करती है तो इसे कानून सम्मत माना जाता है ! जबसे यह कानून लागू किया गया है तबसे ही बताया जाता है कि कुछ पत्नियों ने इसे रूपया कमाने का हथियार बना दिया है ! कानून के लागू होने के प्रारंभ में 2,000 किलोमीटर दूर रहने वाले माता पिता, भाई बहिन व नजदीकी रिश्तेदारों को भी जेलों में ठूंस दिया गया ! इसमें किसी तरह की कोई कानूनी रियायत नहीं दी जाती थी ! सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून में कुछ सुधार किया गया ! परन्तु अधिकाँश मामलों में पति इस प्रकार कानून की जकड़ मैं आता है कि पत्नी का एक झूठ या सच पति को जेल भेज ही देता है ! इन मामलों में निर्दोष पति की फ़रियाद कोई नहीं सुनता ! पत्नी पति को जेल तो भेजती ही है और ऊपर से गुजारा भत्ते की मांग भी करती है ! तलाक मांगने पर मोटी रकम एलिमनी के रूप मैं देनी होती है ! इसके अतिरिक्त पत्नी को मुकदमे का खर्चा भी पति को देना पड़ता है ! मुक़दमा जहां पत्नी रहती है वहीं होता है ! पति को पहले से ही अपराधी समझा जाता है ! इस कारण समाज मैं नवजवान शादी करने से भी कतराने लगे है ! एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट महिलाओं की बराबरी की बात कहता है वहीं ऐसे मामलों बराबरी क्यों नहीं ?
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के अनुसार 7 मामलों मैं से केवल एक मामले मैं ही सजा दी जा सकी है अर्थात 7 में से 6 मामले फर्जी होते है ! वैसे तो गलत मुक़दमा करने पर सजा का भी प्राविधान है परन्तु कोर्ट की मानहानि के मामले में मुकदमे का फैसला होने के बाद ही मानहानि (Perjury) का मुक़दमा किया जा सकता है ! फैसला आने के पहले नहीं ! इस कारण फर्जी मुकदमा साबित होने व पति के बाइज्जत रिहा होने के बावजूद पत्नी को किसी तरह की कोई सजा का प्राविधान नहीं है ! निर्दोष पतियों की फ़रियाद कहीं भी नहीं सुनी जाती ! अनेक मामलों में पति की नौकरी छूट जाती है ! ऐसे मैं उसे गुजारे भत्ते का भी भुगतान पत्नी को करना पड़ता है, यदि वह गुजारा भत्ता नहीं दे पाता है तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है ! यदि पति, पत्नी को तलाक देता है तो काउंटर ब्लास्ट कर पत्नी तुरंत 498-A के अंतर्गत मुक़दमा दायर कर पति को समझौता करने को बाध्य कर देती है, यदि पति तलाक वापस नहीं लेता तो उसे जेल जाना पड़ता है !
यह पहले से ही मान लिया जाता है कि उत्पीड़न केवल पति ही करता है, पत्नी कभी नहीं जबकि यह सच नहीं है l सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि पुरुष भी महिला उत्पीड़न के शिकार होते है ! भारत मैं पुरुषों को पत्नियों द्वारा उत्पीड़न से बचाने हेतु Men’s Right Movement कार्य कर रहा है l यह पुरुषों को कानूनी सहायता देता है l इसकी मांग है कि महिला आयोग की तरह पतियों की मदद हेतु पुरुष योग भी गठित किया जाना चाहिए !
यह कानून केवल पत्नियों को संरक्षण देता है पति को नहीं ! पति के लिए पत्नी की शर्तों पर समझौता या जेल यही विकल्प होता है ! (1) यह एक तरफा लिंग भेद करने वाला कानून है अतः यह आर्टिकल 21 14 का उलंघन करता है ! इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए या (2) पत्नी के द्वारा पति के उत्पीड़न पर पति को भी अधिकार होना चहिये कि वह 498-A के अंतर्गत पत्नी के खिलाफ मुक़दमा कर सके ! (लेखक : डीएन बड़ोला, अध्यक्ष, प्रेस क्लब, रानीखेत )