Sunday, April 21, 2019

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यौन शोषण का आरोप एवं घरेलू हिंसा कानून !
विचित्र किन्तु सत्य है सती अनुसुइया, सती सीता व सावित्री के देश मैं 1860 में बने कानून के अनुसार एक पत्नी द्वारा ब्याभिचार कानून सम्मत है ! परंतु पति द्वारा किया गया ब्याभिचार गैर कानूनी है तथा ऐसे व्यक्ति को व्यभिचार करने पर इंडियन पेनल कोड के सेक्शन 497 के अनुसार पांच साल तक की सजा के साथ ही जुर्मना भी हो सकता है ! 158 वर्ष पुराने इस लिंग भेदी कानून को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने एकमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया है ! सुप्रीम कोर्ट ने कहा है यह संविधान के आर्टिकल 21 जीवन जीने की आजादी व निजता के अधिकार (Right to life and personal liberty) तथा आर्टिकल 14 समानता के अधिकार का उलंघन करता है ! सुप्रीम कोर्ट का इस निर्णय का स्वागत है !
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यौन शोषण के बाद जो स्थितियां आई हैं उनसे स्पष्ट है एक महिला किसी भी व्यक्ति चाहे वह सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस ही क्यों न हो यौन शोषण के आरोप लगाकर उसकी इज्जत पर भयंकर हमला कर सकती है ! महिला के खिलाफ अपराधों के हर केस में पुरुष को प्रारम्भ से ही दोषी समझा जाता है ! सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के ऊपर आरोपों के बाद क्या अब देश के प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति की ऊपर भी कोई महिला यौन शोषण का आरोप लगा सकती है ? इसकी कल्पना करना ही सिहरन पैदा कर देता है !
यह ठीक है कि महिला के अधिकारों की रक्षा की जानी जानी चाहिए, पर क्या पुरुषों के अधिकारों की रक्षा नहीं की जानी चाहिए ? शादी एक सिविल समझौता है ! इसलिए इसके अन्दर शिकायतों का निराकारण सिविल केस के ही तरह क्यों नहीं हो सकता ? तीन तलाक के मामले मैं सरकार इसे क्रिमिनल केस के तौर पर लेना चाहती है, जबकि विरोधी पक्ष इसे सिविल केस के तौर पर बनाए जाने की बात कहती है !
शादी के बाद पति पत्नी के बीच एक और कानून है जो आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! लिंग भेद करने वाली धारा 498-A पति द्वारा पत्नी के ऊपर उत्पीड़न को गैर कानूनी मानती है तथा इसमें सजा का प्राविधान है ! परन्तु यदि पत्नी, पति का उत्पीड़न करती है तो इसे कानून सम्मत माना जाता है ! जबसे यह कानून लागू किया गया है तबसे ही बताया जाता है कि कुछ पत्नियों ने इसे रूपया कमाने का हथियार बना दिया है ! कानून के लागू होने के प्रारंभ में 2,000 किलोमीटर दूर रहने वाले माता पिता, भाई बहिन व नजदीकी रिश्तेदारों को भी जेलों में ठूंस दिया गया ! इसमें किसी तरह की कोई कानूनी रियायत नहीं दी जाती थी !
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून में कुछ सुधार किया गया ! परन्तु अधिकाँश मामलों में पति को तो जेल जाना ही पड़ता है ! इन मामलों में निर्दोष पति की फ़रियाद कोई नहीं सुनता, साथ में उसकी छबि भी एक बदमाश की तरह पेस की जाती है ! पत्नी पति को जेल भी भेज देती है और ऊपर से गुजारा भत्ते की मांग भी करती है ! तलाक मांगने पर एक मुस्त एक मोटी रकम एलिमनी के रूप मैं देनी होती है ! इसके अतिरिक्त पत्नी को मुकदमे का खर्चा भी पति को देना पड़ता है ! मुक़दमा जहां पत्नी रहती है वहीं पर किया जाने का प्रविधान है ! पति को पहले से ही अपराधी समझा जाता है ! पत्नी को पीड़ित मानकर दोषी या निर्दोष पति को पत्नी जेल की हवा खिला कर खुद को गौरवान्वित महसूस करती है ! इस कारण समाज मैं आज के के कई नवजवान शादी करने से भी कतराने लगे है !
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के अनुसार 7 मामलों मैं से केवल एक मामले मैं ही सजा दी जा सकी है अर्थात 7 में से 6 मामले फर्जी होते है ! वैसे तो गलत मुक़दमा करने पर सजा का भी प्राविधान है परन्तु कोर्ट की मानहानि के मामले में मुकदमे का फैसला होने के बाद ही मानहानि (Perjury) का मुक़दमा किया जा सकता है ! फैसला आने के पहले नहीं ! इस कारण फर्जी मुकदमा साबित होने व पति के बाइज्जत रिहा होने के बावजूद पत्नी को किसी तरह की कोई सजा नहीं होती !
निर्दोष पतियों की फ़रियाद कहीं भी नहीं सुनी जाती ! अनेक मामलों में पति की नौकरी छूट जाती है ! ऐसे मैं उसे गुजारे भत्ते का भी भुगतान पत्नी को करना पड़ता है, यदि वह गुजारा भत्ता नहीं दे पाता है तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है ! यदि पति, पत्नी को तलाक देता है तो काउंटर ब्लास्ट कर पत्नी तुरंत 498-A के अंतर्गत मुक़दमा दायर कर पति को समझौता करने को बाध्य कर देती है, यदि पति तलाक वापस नहीं लेता तो उसे जेल जाना पड़ता है !
यह पहले से ही मान लिया जाता है कि उत्पीड़न केवल पति ही करता है, पत्नी कभी भी नहीं जबकि यह सच नहीं है l सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि पुरुष भी महिला उत्पीड़न के शिकार होते है ! भारत मैं पुरुषों को पत्नियों द्वारा उत्पीड़न से बचाने हेतु Men’s Right Movement कार्य कर रहा है l यह पुरुषों को कानूनी सहायता देता है l इसकी मांग है कि महिला आयोग की तरह पतियों की मदद हेतु पुरुष योग भी गठित किया जाना चाहिए ! यह कानून केवल पत्नियों को संरक्षण देता है पति को नहीं ! पति के लिए पत्नी की शर्तों पर समझौता या जेल ही विकल्प होता है !
(1) यह एक तरफा लिंग भेद करने वाला कानून है अतः यह आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए या (2) पत्नी के द्वारा पति के उत्पीड़न पर पति को भी अधिकार होना चहिये कि वह 498-A के अंतर्गत पत्नी के खिलाफ मुक़दमा कर सके या फिर इसे सिविल केस की तरह माना जाना चाहिए ! इससे परिवारों की रक्षा हो सकेगी !
इसी प्रकार एक और प्राविधान दहेज के विषय में है ! दहेज़ एक्ट के अनुसार दहेज़ देना और लेना दोनों ही अपराध है जैसे घूस देना और लेना दोनों ही अपराध है ! लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार दहेज़ देने अपराध नहीं है ! सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार दहेज़ देने वाला व्यक्ति पीड़ित है ! इसलिए इसे अपराध नहीं माना जा सकता ! इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट फैसला एक्ट के प्राविधान को ही बदल देता है ! जिस पर नई परिस्थितयों में पुनर्विचार होना चाहिए !                                 (लेखक : डीएन बड़ोला, अध्यक्ष, प्रेस क्लब, रानीखेत )

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