व्यभिचार की धारा 497 के
निरस्त होने के बाद घरेलू हिंसा कानून 498-A क्यों ?
विचित्र
किन्तु सत्य है सती अनुसुइया, सती सीता व सावित्री के देश मैं 1860 में बने
कानून के अनुसार एक पत्नी द्वारा ब्यभिचार कानून सम्मत है !
परंतु पति द्वारा किया गया व्यभिचार गैर कानूनी है तथा ऐसे व्यक्ति को व्यभिचार
करने पर इंडियन पेनल कोड के सेक्शन 497 के अनुसार पांच साल तक की सजा के साथ
ही जुर्मना भी हो सकता है ! 158 वर्ष पुराने इस लिंग भेदी कानून को
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने एकमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया है !
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है यह संविधान के आर्टिकल 21 जीवन जीने की आजादी व निजता के अधिकार
(Right to life and personal liberty) तथा आर्टिकल 14 समानता
के अधिकार का उलंघन करता है ! सुप्रीम कोर्ट का इस निर्णय का स्वागत है !
शादी के
बाद पति पत्नी के बीच एक और कानून है जो आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! लिंग भेद करने वाली
धारा 498-A पति द्वारा पत्नी के ऊपर उत्पीड़न को
गैर कानूनी मानती है तथा इसमें सजा का प्राविधान है ! परन्तु यदि पत्नी, पति का
उत्पीड़न करती है तो इसे कानून सम्मत माना जाता है ! जबसे यह
कानून लागू किया गया है तबसे ही बताया जाता है कि कुछ पत्नियों ने इसे रूपया कमाने
का हथियार बना दिया है ! कानून के लागू होने के प्रारंभ में 2,000 किलोमीटर
दूर रहने वाले माता पिता, भाई बहिन व नजदीकी रिश्तेदारों को भी
जेलों में ठूंस दिया गया ! इसमें किसी तरह की कोई कानूनी रियायत
नहीं दी जाती थी ! सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून में कुछ सुधार किया गया ! परन्तु
अधिकाँश मामलों में पति इस प्रकार कानून की जकड़ मैं आता है कि
पत्नी का एक झूठ या सच पति को जेल भेज ही देता है ! इन मामलों में निर्दोष पति की
फ़रियाद कोई नहीं सुनता ! पत्नी पति को जेल तो भेजती ही है और ऊपर से गुजारा भत्ते की मांग
भी करती है ! तलाक मांगने पर मोटी रकम एलिमनी के रूप मैं देनी होती है ! इसके
अतिरिक्त पत्नी को मुकदमे का खर्चा भी पति को देना पड़ता है ! मुक़दमा जहां पत्नी रहती है
वहीं होता है ! पति को पहले से ही अपराधी समझा जाता है ! इस कारण
समाज मैं नवजवान शादी करने से भी कतराने लगे है ! एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट
महिलाओं की बराबरी की बात कहता है वहीं ऐसे मामलों बराबरी क्यों नहीं ?
नेशनल
क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के अनुसार 7 मामलों
मैं से केवल एक मामले मैं ही सजा दी जा सकी है अर्थात 7 में से 6 मामले
फर्जी होते है ! वैसे तो गलत मुक़दमा करने पर सजा का भी प्राविधान है परन्तु कोर्ट
की मानहानि के मामले में मुकदमे का फैसला होने के बाद ही मानहानि (Perjury) का
मुक़दमा किया जा सकता है ! फैसला आने के पहले नहीं ! इस कारण फर्जी मुकदमा साबित होने व
पति के बाइज्जत रिहा होने के बावजूद पत्नी को किसी तरह की कोई
सजा का प्राविधान नहीं है ! निर्दोष पतियों की फ़रियाद कहीं भी नहीं सुनी जाती !
अनेक मामलों में पति की नौकरी छूट जाती है ! ऐसे मैं उसे गुजारे भत्ते का भी भुगतान
पत्नी को करना पड़ता है, यदि वह गुजारा भत्ता नहीं दे पाता है
तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है ! यदि पति, पत्नी
को तलाक देता है तो काउंटर ब्लास्ट कर पत्नी तुरंत 498-A के अंतर्गत मुक़दमा दायर कर पति को
समझौता करने को बाध्य कर देती है, यदि पति तलाक वापस नहीं लेता तो उसे
जेल जाना पड़ता है !
यह पहले
से ही मान लिया जाता है कि उत्पीड़न केवल पति ही करता है, पत्नी
कभी नहीं जबकि यह सच नहीं है l सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि पुरुष
भी महिला उत्पीड़न के शिकार होते है ! भारत मैं पुरुषों को पत्नियों द्वारा उत्पीड़न
से बचाने हेतु Men’s Right Movement कार्य कर रहा है l यह
पुरुषों को कानूनी सहायता देता है l इसकी मांग है कि महिला आयोग की तरह
पतियों की मदद हेतु पुरुष योग भी गठित किया जाना चाहिए !
यह
कानून केवल पत्नियों को संरक्षण देता है पति को नहीं ! पति के लिए पत्नी की शर्तों
पर समझौता या जेल यही विकल्प होता है ! (1) यह एक तरफा लिंग भेद करने वाला कानून
है अतः यह आर्टिकल 21 व 14 का उलंघन करता है ! इसलिए इसे निरस्त
किया जाना चाहिए या (2) पत्नी
के द्वारा पति के उत्पीड़न पर पति को भी अधिकार होना चहिये कि वह 498-A के
अंतर्गत पत्नी के खिलाफ मुक़दमा कर सके ! (लेखक : डीएन बड़ोला, अध्यक्ष, प्रेस
क्लब, रानीखेत )

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