Tuesday, April 18, 2017

7-Travel Series- Ranikhet Club, Army School, Rani Jheel to Rajiv Park

                                               रानीखेत क्लब से रानी
झील से राजीव पार्क तक का नजारा देखें इस वीडियो में !




रानीखेत क्लब से
राजीव पार्क के लिए एक सड़क सदाबहार वनों के बीच से गुजरती है ! यह सड़क बहुत अच्छी
स्थिति में है ! पहली बार परसों मुझे भी वहाँ से जाने का मौका मिल ! रानीखेत क्लब
से मिलिट्री ऑफिसर’ गेस्ट हाउस, आर्मी स्कूल, रानी झील होते हुए  हुए राजीव पार्क पहुँचती है ! यह  2 किलोमीटर लम्बी सड़क  मोर्निंग और इवनिंग वाक हेतु लोगों की पहली पसंद
 है ! मॉल रोड में मरम्मत का कार्य होने के
कारण इस सड़क पर ट्रैफिक था अन्यथा यह शांत सड़क है ! आप भी इस सड़क का लुफ्त उठा
सकते हैं ! मैंने इसका एक वीडियो तैयार किया है ! अकेला था इसलिए इसमें कमियाँ हैं
पर प्रकृति की गोद के बीच से गुजरती इस सड़क का आप आनन्द उठा सकते है  !  

Saturday, April 15, 2017

WRITE TO PRIME MINISTER-CAMPUS OF UTTARAKHAND AYURVED UNIVERSITY AT RANIKHET

Write To The Prime Minister !  http://pgportal.gov.in/pmocitizen/Grievancepmo.aspx मैंने एक पत्र प्रधान मंत्री महोदय को लिखा है ! आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है!
        विषय : रानीखेत में उत्तराखण्ड आयुर्वेद का कैंपस कॉलेज खोले जाने विषयक !    महोदय ! याद कीजिये वह क्षण जब धरती पर एक नवजीवन शिशु के रूप मैं उदित होता है तो सबसे पहले शिशु की पहली किलकारी की आवाज  के साथ ही वह आयुर्वेद के  सरंक्षण मैं आ  जाता है ? सर्वप्रथम शिशु की नाल काटने के पश्चात नाभि मैं  हल्दी का  लेप  किया जाता है ? उसके बाद शिशु को फिटकरी के पानी से स्नान कराया  जाता है ! फिर रुई मैं शहद भिगोकर शिशु को उसका पहला भोजन कुछ  बूँद शहद  चटाया जाता है ! हल्दी, फिटकरी व शहद इन तीनों का ही आयुर्वेद मैं बहुत बड़ा महत्व है ! इसके पश्चात जरूरत पड़ने पर शिशु को बाल जीवन घुट्टी व अमृत धारा पिलाई जाती है ! इन पांच  दवाओं का शिशु के जीवन मैं कितना महत्व है यह आप जानते हैं  !
जन्म के होते ही आयुर्वेद का साथ ! यह है आयुर्वेद की हमारे जीवन मैं महत्ता ! शिशु की जननी को प्रसव काल मैं अशोकारिष्ट व प्रसव के बाद दसमूलारिष्ट, पजीरी आदि  दी जाती  है ! शिशु की देखभाल की यह प्रथा हमारे समाज मैं पुरातन काल से प्रचलित है ! यदि हम यह कहें कि हर शिशु आयुर्वेद शिशुहोता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी !  महोदय याद कीजिये लक्ष्मण शक्ति का वह द्रश्य जिसमें हनुमान ‘संजीवनी बूटी’ लाते हैं और  सुषेण वैद्य लक्ष्मण को जीवन दान देते हैं ! मान्याताओं के अनुसार उस संजीवनी बूटी पर्वत का एक हिस्सा रानीखेत के समीप दूनागिरी में गिरा है ! 
हिमालय आयुर्वेद की जन्मस्थली है ! सरकार ने इसे आयुष प्रदेश घोषित किया है ! जड़ी बूटी के भण्डार देव भूमि उत्तराखण्ड से त्रिदेव ब्रह्मा द्वारा महर्षि धन्वन्तरी को प्राप्त ज्ञान की इस परंपरा को रानीखेत की जनता सहेजना चाहती है ! इसी कारण से रानीखेत के पूर्व विधायक अजय भट्ट जो भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी है, ने भी  रानीखेत में उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कैंपस की स्थापना हेतु प्रयास किया ! प्रयास फलीभूत भी हुवा और सरकार ने इसकी स्वीकृति भी दे दी !  विश्वविद्यालय कुलपति ने उत्तराखण्ड सरकार से प्रारंभिक खर्चे हेतु 25 करोड़ की धन राशि हेतु पत्र लिखा जो सरकार में  लंबित है l
महोदय, विनम्र निवेदन है कि भारत सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने हेतु कृत संकल्प है अतः रानीखेत मैं कैंपस कालेज खोले जाने हेतु उत्तराखण्ड सरकार को आवश्यक निर्देश  करने की कृपा करें क्योंकि कुमायूं में आयुर्वेद विश्वविद्यालय का कोई कैंपस नहीं है जबकि गढ़वाल के इलाके में दो कैंपस स्थापित किये गए है ! धन्यवाद !
डी एन बड़ोला,                                                                      अध्यक्ष,                                                                           प्रेस क्लब,                                                                       बड़ोला कॉटेज रानीखेत                                                               उत्तराखंड  मोबाइल नंबर : 9412909980
14.4.2017




Sunday, April 9, 2017

6 Travel series-Ranikhet ki sair रानीखेत की सैर मात्र 10 मिनट मैं !

                                                      रानीखेत की सैर मात्र 10
मिनट मैं !
                                                                                                         Un-edited
version. 


Thursday, April 6, 2017

Hindu Rashtr; Akhand Bharat ! क्या भारत बनेगा हिन्दू राष्ट्र ? क्या भारत बनेगा अखंड भारत ?

क्या भारत बनेगा हिन्दू राष्ट्र ? क्या भारत बनेगा अखंड भारत ?
मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान के बाद कल हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे पर छोटे परदे पर जम कर चर्चा हो रही थी ! अनेक हिन्दू संघठन चाहते हैं की भारत एक हिंदू राष्ट्र हो ! प्रश्न है की क्या यह सम्भव है ? क्या भारत कभी हिन्दू राष्ट्र था ? क्या भारत कभी अखंड भारत जिस कोई देश था ? चलिये इस परिकल्पना को आंकडो के परिपेक्ष मैं समझैं ! गूगल से लिए गए आंकड़ों के अनुसार
भारत की वर्तमान जनसँख्या लगभग 1,22,64में हिन्दू, 80.5% अर्थात 99,52,57,428 हैं ! मुसलमान 13.4 प्रतिशत अर्थात 16,56,70,181 तथा अन्य की जनसँख्या 5.3 प्रतिशत अर्थात 6,55,26,266 है ! अभी तक भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है साथ मैं जनतंत्र भी है ! लोकतंत्र में बहुमत या आम सहमति से फैसले होते हैं ! अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि हिन्दू राष्ट्र की रूप रेखा क्या होगी ? जब तक हिन्दू राष्ट्र की स्पष्ट व्याख्या नहीं होती है तब तक यह मुद्दा हवा में यदा कदा उछलता ही रहेगा ! इससे प्रेम भाव नहीं बढ़ेगा ! इसलिए सर्व प्रथम मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को हिन्दू राष्ट्र की रूप रेखा की स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए !
अखंड भारत !
 भारत, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यानमार (बर्मा), तिब्बत , अफगानिस्तान, बंगलादेश आदि को मिलाकर अखण्ड भारत का निर्माण हो ! यह है अखण्ड भारत की परिकल्पना ! ज्ञान्तव्य हो इस परकल्पित अखण्ड भारत की कुल जनसंख्या 1,72.94,89,661 हो सकती है ! इसमैं 63% हिन्दू है ; 32% मुस्लिम हैं तथा 5% बौद्ध आदि है ! इस सम्बन्ध मैं इन सब देशों की जनसंख्या का विवरण नीचे दिये गया है ! यह आंकडे इंटरनेट से लिये गए है ! लिंक नीचे दिया गया है !
हिंदू…63%; मुस्लिम…32%; बौद्ध …5%
क्या इससे हिंदू समाज को फायदा होगा ? क्या राम राज्य का सपना साकार करने का यह एक मार्ग हो सकता है ? क्या यह संभव है ? क्या कभी अखंड भारत जैसा कोई देश था भी ? क्या अखंड भारत की बात कर हम भारत को एक विस्तारवादी देश के रूप मैं तो प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं ? क्या चीन के अंतर्गत है ! क्या चीन तिब्बत को अखंड भारत में शामिल होने की सहमती देगा ? क्या पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान प्रस्तावित अखंड भारत में सम्मिलित होना चाहेंगे ? क्या हमैं इनका समर्थन करना चाहिये ? यह आप पर निर्भर है की स्वयं सोचैं कि क्या यह सम्भव है ? इसलिए आवश्यकीय है अखंड भारत की परिकल्पना स्पष्ट करने हेतु कार्य किया जाय ! हमें इस कार्य से यस मिले अपयस नहीं ! यही मेरी कामना है !
,53,875 है जिस
संभावित अखंड भारत की जनसंख्या के आंकड़े अध्ययन हेतु प्रस्तुत हैं !
India…………………………..1,06,55,94,600……… ( 1,24,77,70,000(-) 18,21,75,400 Muslims)
Nepal………................. 2,64,94,504………….. 1,09,20,89,104….. Hindu Population
Indian Muslims …………......18,21,75,400
Afghanistan…………………….. 2,60,23,100
Pakistan………………………….18,80,20,000
Bangladesh……………..15,67,71,000…………….. 55,29,89,500……Muslim Population.
Burma (Mynamar)……….6,03,80,000
Sri Lanka………………….2,02,77,597
Bhutan ……………………….7,50,460
Tibet………………………. 30,03,000 ………………….8,44,11,057…… Bauddh
Grand Total : 1,72.94,89,661…………अखंड भारत की परिकल्पित जनसँख्या
ये चौथा खम्बा क्या है भाई ? और आया कहाँ से ?
भारतीय संविधान के अनुसार सरकार के तीन स्तम्भ हैं कार्यपालिका, न्यायपालिका व विधायिका ! पर मीडिया ने इन तीन स्तंभों के बीच मीडिया ने नारद मुनि की तरह ऐसी सेंध लगाईं कि मीडिया बन गया चौथा स्तम्भ जिसे लोग चौथा खम्बा कहलाना बेहतर समझते हैं ! समझ में नहीं आया यह चौथा खम्बा कहाँ से और कैसे आया ? इस खम्बे ने सरकारों पर ऐसा कहर ढाया है कि सरकारें इसके प्रकोप से थर थर कांपती हैं ! इस चौथे खम्बे का कहर देखना है तो देखिये टेलीविज़न के छोटे परदे पर ! एक अदना सा एंकर छोटे परदे में शहंशाह बन, बड़े से बड़े नेता नेता की वाट लगा देता है ! जब वह किसी भी नेता को हड़काता है तो नेता जी की कैसी घिघ्घी बंध जाती है ! यह आपने भी महसूस किया होगा ! जब एंकर टेलीविज़न पर अपना जलवा दिखाते हैं तो लगता है जैसे संसार के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति वह ही हों, जैसे सारी ईमानदारी और निष्पक्ष होने का ठेका उन्होंने ही लिया हो ! सरकारों को राज काज चलाने की ट्रेनिंग वह ऐसे देते हैं जैसे पता नहीं कितनी सरकारें उन्होंने चलाई हों ! वह स्वयं को सर्वगुण संपन्न एवं सर्वश्रेष्ठ मानते हुए नेताओं के ऊपर ऐसे हावी होने का प्रयास करते हैं कि नेता जी बगलें भी नहीं झाँक पाते ! क्योंकि नेता जी स्वयं को एंकर से दोयम कैसे समझ सकते हैं ? एंकर नेताओं को तमीज सीखने की भी ट्रेनिंग देता है ! वह दुनियाँ के हर नेता को भ्रस्टाचारी एवं स्वयं को सदाचारी घोषित कर छोटे परदे के बाहुबली का बखूबी रोल निभाने मैं पटु होता है ! एंकरों की भी दो प्रजाति होती हैं ! पुरूष और महिला ! पुरुष को तो नेता किसी तरह झेल ही लेता है परन्तु महिला एंकर नेता जी की ऐसी घिग्घी बंधाती हैं कि नेता जी बगलें ही झांकते रह जाते हैं ! एंकरों की वाणी में अहंकार की तुलना कैसे करूं ? समझ लीजिये जैसे आसमान में बिजली चमकती है वैसे ही एंकर महोदय या महोदया की गर्जना अपनी चमक की धमक छोटे परदे पर यदा कदा दीखती रहती हैं ! नेता जी को उनका मुहं (माइक) बंद करने की धमकी इस चमक में उनका ब्रह्मास्त्र होता है ! इस अस्त्र के बाद तो नेताजी त्राहिमाम के तर्ज पर अपना मुहं ही सिल लेते है ! पर एंकर का सत्ता पक्ष के पेनलिस्ट की तरफ नजरिया कुछ भिन्न होता है ! उन्हें एंकरों की तरफ से कुछ सम्मान मिल जाता है ! पर टीवी स्टूडियो के बाहर एंकरों की की चमक-धमक काफी हद तक रफू चक्कर हो चुकी होती है ! विरोधी कब सत्ता पक्ष बन जाए क्या पता ? इस बात का वह बखूबी ध्यान रखते हुए चौथे खम्बे की धमक बरक़रार रखने का प्रयास करते दीखते हैं ! नेता या पेनालिस्ट्स की जवान पकड़ कर वह मुद्दा लपक लेते है ! कभी मुद्दा शराब है तो कभी गोस्त, कभी मुद्दा सांप है तो कभी चूहा ! एक बार हम भी इनके चक्कर में फंसे ! एक कार चल रही थी बिन ड्राईवर के और सुबह से शाम तक कर चलती रही ! देर शाम पर्दाफ़ाश हुवा कि पिछली सीट से वह कार चलाई जा रही थी ! किसी के थप्पड़ लगे या न लगे ! पर एंकर महोदय चिल्लायेंगे - तगड़ा लगा थप्पड़ नेता जी के गाल पर ! इसी बात पर कुछ पेनलिस्ट बैठाए जायेंगे ! और प्रश्न होगा - क्या किसी नेता को सरे बाजार महफ़िल में थप्पड़ लगाना वाजिब है, क्या थप्पड़ लगा कि नहीं ? धुंवाधार वाद विवाद चलता है और अंत में सभ्य समाज के इस पेनल में थप्पड़ को असभ्यता घोषित कर दिया जाता है ! और सबसे अंत में एंकर महोदय हर पेनलिस्ट को 30 सेकंड में, केवल 30 सेकंड में उत्तर देने का दादागिरी वाला फरमान सुनाते हैं और सारे नेता उसे हेडमास्टर का फरमान सुन अपनी बारी का इंतज़ार करते लगते है ! उसमें भी कभी कभी सबके बोलने से पहले चैनल बदल दी जाती है ! जिनको मौका मिलता है यदि वह विरोधी पक्ष का ही तो पेनलिस्ट महोदय कहेंगे झापड़ तो पड़ा ही नहीं, केवल प्रयास किया गया ! पर इस प्रयास की वह भर्त्सना करते हैं और सता पक्ष के नेता भी इसकी भर्त्सना करेंगे पर झापड़ पड़ा या नहीं इस मुद्दे को गोल कर जायेंगे और वाद विवाद का समापन हो जाएगा ! और कुछ पेनालिस्ट दूसरे चैनल में किसी अन्य विषय पर अपनी एक्सपर्ट राय देने हेतु प्रस्थान कर जायेंगे ! (This is a piece of humour !)

Wednesday, April 5, 2017

Letter to Trivendr Rawat , Chief Minister, Uttarakhand


[5:35 PM, 3/31/2017] +91 94129 09980: Apoorva Joshi सम्पादक ने एक लिखा है जो आपके अवलोकनार्थ प्रेषित है ! इसमें सबसे नीचे मैंने 2 कमेंट भी दिए है ! एक खत मुख्यमंत्री के नाम प्रिय त्रिवेंद्र जी, भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में सत्तासीन हो चुकी है। ऐसा बहुमत अपेक्षित नहीं था। न उत्तर प्रदेश में, न ही उत्तराखण्ड में। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार ने कई ऐसे कामों को अंजाम तक पहुंचाया था जिनके बल पर वह सत्ता वापसी के प्रति आश्वस्त थे। इसी प्रकार विजय बहुगुणा के विवादित कार्यकाल के बाद हरीश रावत सरकार एक काम करने वाली सरकार रही। रावत ने केदारनाथ में युद्ध स्तर पर पुर्ननिर्माण के कार्य कराए। पहाड़ से पलायन रोकने, आम आदमी को स्वास्थ्य संबंधी बीमा उपलब्ध कराने, पहाड़ी उत्पादों को बाजार मुहैया कराने से लेकर अनेक ऐसे कार्य हैं जिनका श्रेय रावत को दिया जाना चाहिए। इस सबके बावजूद अखिलेश और हरीश के नेतृत्व में सपा- कांग्रेस को भारी पराजय का मुंह यदि देखना पड़ा तो इसके पीछे जरूर कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारण रहे होंगे जिन्होंने जनता को मजबूर किया होगा कि वे इन दोनों को नकार भाजपा के नेतृत्व में आस्था प्रकट करे। चलिए प्रयास करते हैं उत्तराखण्ड में कांग्रेस की हार के पीछे रहे कुछेक महत्वपूर्ण कारणों को समझने का। साथ ही इस भारी जनादेश के बाद आपकी सरकार पर आन पड़ी इस जिम्मेदारी की भी जो आपको उत्तराखण्ड की जनता ने बहुत विश्वास के साथ सौंपी है। सबसे पहले तो मैं ईवीएम मशीन के चमत्कार की कहानियों पर अपना अविश्वास सामने रखता हूं। यह सही है कि इन मशीनों पर छेड़छाड़ संभव है। बहुत से तरीके हैं जिनके जरिए मशीन को टेंपर यानी छेड़ा जा सकता है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर ऐसा हो पाना संभव प्रतीत नहीं होता। निश्चित ही यह नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के भरोसे का नतीजा है कि भाजपा उप्र और उत्तराखण्ड में इतने बड़े बहुमत को पा पाने में सफल रही है। साथ ही यह जीत उस परसेप्शन के चलते भी हुई है जो हरीश रावत सरकार को भ्रष्ट सरकार की छवि दे पाने में सफल रहा। अथक परिश्रम करने वाले सीएम की छवि के बावजूद हरीश रावत अवैध खनन और शराब माफिया संग अपनी सरकार के गहरे रिश्तों के आरोपों से बाहर निकल पाने में विफल रहे। इसके पीछे एक बड़ा कारण उनके कुछेक करीबी साथियों का आचरण रहा जिनका खामियाजा अंततः कांग्रेस को करारी पराजय के रूप में भुगतना पड़ा। मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत को अक्सर अपने इन सहयोगियों के दबाव के चलते कई ऐसे निर्णय लेने पड़े जिन्होंने जनता के मध्य उनकी छवि को प्रभावित करने का काम किया। दूसरा बड़ा कारण सरकार और संगठन के बीच तालमेल का अभाव रहा। पार्टी अध्यक्ष किशोर उपाध्याय अपनी ही सरकार के खिलाफ काम करते दिखे। किशोर की नाराजगी सरकार से कम हरीश रावत संग ज्यादा थी। किशोर को पूरा विश्वास था कि हरीश रावत उन्हें राज्यसभा भेजे जाने के लिए आलाकमान को तैयार कर लेंगे। हुआ इसके ठीक उलट। रावत ने अपने करीबी प्रदीप टम्टा को राज्यसभा भेज किशोर के राजनीतिक भविष्य की नींव हिलाने का काम किया। इससे आहत किशोर पूरी तरह बगावत पर उतर आए। टिहरी सीट से टिकट पाने की उनकी कोशिश भी नाकाम हो गई। हरीश रावत ने उनके बजाय निर्दलीय दिनेश धन्नै को तरजीह दी। एक अन्य बड़ा कारण सरकार का अस्थिर रहना रहा। हरीश रावत चाहकर भी कई ऐसे फैसले नहीं ले पाए जिनका सीधा असर उनके साथियों के भ्रष्ट आचरण से था। रावत सरकार के मंत्री अपनी पसंद के अफसरों को तबादला कराने से लेकर निर्माण कार्यों के टेंडरों को मैनेज करने के लिए सुर्खियों में बने रहे। इससे सरकार की छवि खासी प्रभावित हुई। नतीजा जनता ने एकतरफा भाजपा को वोट देकर रावत सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। न केवल गढ़वाल, बल्कि तराई और कुमाऊं जो हरीश रावत का गढ़ माना जाता रहा है। इसके बावजूद जनता ने यदि भाजपा को जिताया तो निश्चित ही इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हरीश रावत सरकार के प्रति जनता का आक्रोश रहा जिसे समझ पाने में न केवल कांग्र्रेस, बल्कि सभी राजनीतिक पंडित भी विफल रहे। जाहिर है जिस प्रचंड बहुमत से भाजपा उत्तराखण्ड में सत्ता में आई है, उतनी ही प्रचंड जनापेक्षाओं का दबाव भी उसके ऊपर है। आपकी प्रशासनिक क्षमताओं को परखा जाना अभी बाकी है। आपने पिछली सरकार के कार्यकाल में हुए घोटालों पर सख्ती बरतने का इशारा अपने पहले ही निर्णय से कर दिया है। एनएच 74 जमीन घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दे आपने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आपकी सरकार भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेगी। संकट लेकिन यह है कि आपके मंत्रिमंडल में शामिल अनेक मंत्रियों की छवि दागी है। कांग्रेस से भाजपा में गए हरक सिंह रावत पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। स्वयं भाजपा उन पर हमेशा आक्रामक रही है। पहली बार राज्यमंत्री बनी रेखा आर्य अपने पति के चलते विवादों में रही हैं। आर्य के पति पर कई आपराधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हैं। दिल्ली सरकार में आर्य के पति को सीएम हरीश रावत के आस-पास देखा जाता था। अब आपके संग भी उनकी तस्वीरें देखने को मिल रही हैं। इससे शंका पैदा होती है कि आपकी सरकार वाकई भ्रष्टाचार और अपराध जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कुछ सकारात्मक कर पाएगी। यहां यह भी हमें याद रखना होगा कि भाजपा की पिछली सरकारों में भारी भ्रष्टाचार देखने को मिला था। जनरल खण्डूड़ी की सरकार में सीएम के प्रमुख सचिव सारंगी पर गंभीर आरोप लगे थे। हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में भारी लेन-देन की बात तब सामने आई थी। बाद में डाॅ . निशंक की सरकार को भी नाना प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझना पड़ा था। सिटुरजिया जमीन घोटाले में तो उच्च न्यायालय नैनीताल ने राज्य के अफसरों पर कठोर टिप्पणी तक की थी। ऐसे में प्रश्न उठना, आशंका उठनी लाजिमी है कि क्या मात्र चेहरा बदल जाने से सब कुछ ठीक हो सकता है। नौकरशाह वही, राजनीतिक संगी-साथी वही, तब आप कैसे एक स्वच्छ सरकार दे सकेंगे। बहरहाल इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में हैं। इसलिए अभी से आशंकित होने की बजाय जरूरत है आपको थोड़ा वक्त देने की। जरूरत है आपकी कार्यशैली को समझने की। हो सकता है आपके रूप में हमें यशवंत परमार सरीखा मुख्यमंत्री मिल गया हो जो उत्तराखण्ड की दशा और दिशा दोनों को बदलने की कुव्वत रखता हो। कम से कम हम यह सद्इच्छा तो रख ही सकते हैं। त्रिवेंद्र जी समस्त उत्तराखण्ड वासियों की तरफ से मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप एक कठिन दौर में राज्य के मुखिया बने हैं। एक ऐसी व्यवस्था आप को विरासत में मिली है जिसे पूरी तरह दीमकों ने खोखला कर दिया है। आप पर इसलिए बहुत बड़ा दायित्व है इसे बिखरने न देने का। आप का मार्ग बेहद कठिन है। इसमें फूल गिनती के हैं, कांटे चारों तरफ असंख्य बिखरे पड़े हैं। आपके समक्ष अपने साथियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का भारी दबाव रहेगा। कहीं ऐसा न हो आप भी अपने पूर्ववर्तियों की भांति थोक में लालबत्ती बांटने को विवश हो जाएं। मैं आपको अमेरिका के चैतीसवें राष्ट्रपति आइजनहाॅवर का कथन याद दिलाना चाहूंगा - “The supreme quality of leadership is unquestionable integrity. Without it, no real success is possible, no matter whether it is on a section gang, football field, in an army, or in an office”. अब यह आप के ऊपर है कि आप इतिहास में स्वयं को कैसे दर्ज कराना चाहते हैं। हम तो आपके लिए केवल सद्इच्छा और शुभकामनाएं दे सकते हैं। आपकी ताजपोशी उत्तराखण्ड के लिए स्वर्णिमकाल हो ऐसी उम्मीद के साथ आपको गुरूवर रविंद्रनाथ टैगोर की एक प्रार्थना का स्मरण कराना चाहूंगा ताकि आप अपने कर्तव्यों के समक्ष आने वाली बाधाओं से विचलित न होते हुए उत्तराखण्ड को सही में देवभूमि का दर्जा दिला सकें - जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ और सिर हो शान से उठा हुआ जहां ज्ञान हो सबसे लिए बेरोकटोक बिना शर्त रखा हुआ जहां घर की चैखट सी छोटी सरहदों में न बंटा हो जहां जहां सच की गहराइयों से निकले हर बयान जहां बाजुएं बिना थके लकीरें कुछ मुकम्मल तलाशें जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायते जहां दिलो दिमाग तलाशे नए ख्याल और उन्हें अंजाम दें ऐसी आजादी के स्वर्ग में, हे भगवान, मेरे वतन की हो नई सुबह। समस्त शुभकामनाओं सहित आपका [5:36 PM, 3/31/2017] +91 94129 09980: My comment on the above is as below : [5:36 PM, 3/31/2017] +91 94129 09980: DN Barola Apoorva Joshi : आपका मूल्यांकन पूर्णतया सही है ! एकला चलो – खाता न बही जो हरीश रावत कहे वही सही की नीति भी एक महत्वपूर्ण कारक थी ! मैं पत्रों के द्वारा उन्हें चेताता रहा ! उनका जनसंपर्क टूट रहा था तब मैंने उन्हें जुलाई 2016 में पत्र लिखा था – ... . Sir if you allow me I would like to take the liberty to say that in spite of your best efforts at times you become ‘a lone man in the crowd’. On many occasions you are surrounded by people in en-mass where you seem to be accessible to everyone and at the same time to none.... परंतु मुख्य मंत्री जी किसी की नहीं सुन रहे थे ! रही सही कसर सत्ता विरोधी लहर ने पूरी कर दी ! पर नए मुख्य मंत्री जी इस सब से सबक लेकर अपना कार्य ईमानदारी व लगन से करेंगे तो उन्हें अवश्य सफलता मिलेगी ! ऐसा मेरा सोचना है ! क्रमशः .... Like · Reply · 20 mins · Edited DN Barola DN Barola Apoorva Joshi : मैंने किशोर उपाध्याय जी से उनकी मतभेदों के विषय में भी लिखा था और उनसे अनुरोध किया था कि उन्हें चुनाव में अपनी सीट चुनने का अधिकार दिया जाना संगठन के हित मैं होगा ! पत्र के कुछ आवश्यकीय अंश इस प्रकार हैं ! “I am grieved Mr. Chief Minister, I am grieved! Yes Mr. Chief Minister, I am talking about the unnecessary differences between you and Sri Kishore Upadhyaya. I am worried because this is taking place at a time when the elections are so near! I had a talk with Sri Kishore Upadhyaya yesterday. While you had posted me as Congress Election-in-charge Uttarakhand in 2000, I had the privilege of having the association of almost all senior or junior leaders. Mr. Kishore was your bosom friend and today things are tearing apart so far that this has become a matter of media. May be for a towering Chief Minister with massive support of the masses and the High Command, it will be possible for you to tackle this issue at your leisure. But to me the only point for consideration is why delay it? Delay in politics sometimes is dangerous. Why not nip the problem in the bud. Sir, with your multifarious skill, efforts and great art of oratory you have already survived the greatest onslaught from your rival cabinet Colleagues strongly aided by the Bharatiy Janata Party. But you must remember scars take time to heal! I had elsewhere also written that the Congress President must have the right to choose a seat for himself in the election. I had further written that at the risk of being misunderstood as a villain, I would dare state that with the elections so near, you must think about bringing the concept of collective leadership in the Cabinet which would bring harmony and respect of the colleagues for you. It is also important that you take out 2-3 minutes time for people like me so that we may tell you where the things are becoming pinching. Like · Reply · 1 · 20 mins · Edited Sunil Negi Sunil Negi Well articulated

Hill Development Board at Gairsen is the need of the hour for developing hills.


पर्वतीय अंचल के विकास हेतु गैरसैण में पर्वतीय विकास परिषद का गठन किया जाय – बड़ोला रानीखेत प्रेस क्लब के अध्यक्ष डीएन बड़ोला ने उत्तराखण्ड के नव निर्वाचित मुख्य मंत्री त्रिवेंद्र रावत को उत्तरखण्ड राज्य के नए मुख्य मंत्री बनने के अवसर पर बधाई दी है ! उन्होंने एक पत्र के माध्यम से मुख्य मंत्री को पर्वतीय की वर्तमान समस्याओं के विषय में लिखा है कि पहाड़ से पलायन की गति बढ़ती जा रही है ! रोजगार, शिक्षा, बंदरों व अन्य जानवरों के आतंक से लोग परेशान होकर पहाड़ छोड़ रहे हैं ! यह पलायन अधिकतर उत्तराखण्ड के मैदानी क्षेत्रों को हो रहा है ! प्रश्न है यह कैसे बंद हो ? 16 साल से यह पलायन अनवरत जारी है पर कोई भी सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही है ! जनसंख्या घटने से हमारे विधायक 40 के बजाय 30 रह गए हैं ! हर परिसीमन के साथ यह संख्या घटती जायेगी ! पहाड़ से जो पहाड़ी मैदानी क्षेत्रों को पलायन करते हैं वह पहाड़ वापस नहीं आना चाहते ! उन्हें किच्छा, सितारगंज पसंद है भीमताल, नैनीताल नहीं ! उनका इसमें कोई कसूर नहीं है ! उन्हें वहाँ ज्यादा सुविधा है इसलिए वह वहाँ रहना चाहते हैं ! प्रकृति ने इन दोनों स्थानों के लिए भिन्न भिन्न स्थितियां बनाई है ! ऐसे में इसका एक ही हल है l यदि नई सरकार पहाड़ के विकास के लिए वास्तव में प्रतिबद्ध है तो लद्दाख की तर्ज पर गैरसैंण में पर्वतीय विकास परिषद् का गठन किया जाय ! यदि पहाड़ी क्षेत्र को एक अलग इकाई के रूप में विकसित किया जाय तो पहाड़ की समस्याओं का समाधान हो सकता है ! इस अलग इकाई का कार्यालय का संचालन गैरसैण से हो ! इसक बजट भी अलग हो ! इसके कर्मचारियों को पर्वतीय अंचल में ही रहना होगा ! परन्तु यह होगा उत्तराखण्ड के ही अधीन ! मैं समझता हूँ तब ही यह स्वपोषित राज्य बन सकेगा ! क्योंकि पहाड़ में पर्यटन व्यवसाय, बागवानी, जड़ी बूटी के दोहन आदि की अपार संभावनाएं हैं ! अकेला पर्यटन ही हमें स्वपोषित राज्य बना देगा ! यदि मैदानी क्षेत्र की आबादी एक हद से ज्यादा बढ़ती गई तो मैदानी क्षेत्र मैं नई नई समस्याएँ पैदा होंगी ! इसलिए मैदानी क्षेत्रों के हित में भी पहाड़ से मैदानी क्षेत्र को पलायन रोकना आवश्यकीय होगा ! विभिन्न भोगोलिक संरचना के कारण दोनों क्षेत्रों के विकास में भी भिन्नता होगी ! पर्वतीय पर्यटन बढ़ने से मैदानी क्षेत्र को भी लाभ होगा ! बागवानी एवं जड़ी बूटी की मार्केटिंग भी तो मैदानी क्षेत्र में ही होगी ! इस सच को देर सबेर लोग स्वीकार करेंगे कि दो विभिन्न भोगोलिक क्षेत्रों के लिए दो इकाई समय की आवश्यकता है ! पहाड़ी राज्य को मैदानी क्षेत्र से मिलाकर पहाड़ का विकास करने की योजना फेल हो चुकी है ! इसलिए मेरे इस विचार पर गहन मंथन करना

शराब मिले तो ख़राब, और न मिले तो भी ख़राब ! Prohibition - Wine


शराब करे ख़राब ? शराब मिले तो ख़राब, और न मिले तो भी ख़राब ! जी हाँ ! कल रानीखेत में भी शराब की दुकानें बंद हो गईं ! पर यह क्या हमें तो लगा था लोग शराब बंदी से खुश होंगे ! हमने बात चलाई तो एक व्यापारी बोले अरे देखिये न साब बाजार में तो रौनक ही नहीं है ! पहले से ही ठंडी रानीखेत बाजार बिलकुल ही ठंडी हो गई है ! बाजार में आदमी ही नहीं है तो दूकान क्या ख़ाक चलेगी ! हमारा तो बहुत नुकशान हो गया ! कुछ ऐसे हे शब्द अन्य व्यापारियों ने कहे ! हमने भी महसूस किया कि रानीखेत बाज़ार मैं फिलहाल तो ठलुए भी नहीं दिखलाई दे रहे हैं ! एक नेता टाइप व्यापारी बोले भाई साहेब लोग दारू की दूकान में भीड़ के कारण कुछ लोग इधर उधर दुकानों की तरफ रुख करते थे ! कुछ ठंडा पीते थे तो कुछ बच्चों के लिए टॉफ़ी या मिठाई आदि खरीदते थे ! शराब खरीदने के बाद कई लोग होटलों की तरफ रुख करते थे ! उनकी भी मीट, कलेजी, मुर्गे की बिक्री हो जाती थी ! दारू पीकर आदमी दिलेर हो जाता है इसलिए वह पैसे की परवाह नहीं करता और सबका ही धंधा चलता है ! चाय की दुकान मैं छोले समोशे की बिक्री हो जाती है ! पर फ़िलहाल जब तक नया ठेका नहीं हो जाता हमारा धंधा तो मंदा ही रहेगा ! बस उपर वाले से प्रार्थना है दारू की दूकान आस पास ही खुले तो कम से कम अपने तो बिक्री होने लगेगी ! यह था सिक्के का दूसरा पहलू ! मुझे याद है उत्तराखंड मैं 1984 में उत्तराखंड संघर्ष वाहनी ने शराब बंदी के लिए आन्दोलन चलाया गया था ! इस आन्दोलन में लोक चेतना मंच की भी भागीदारी रही ! मंच के अध्यक्ष के तौर पर मैंने भी इस आन्दोलन में भाग लिया था ! कुछ ही समय बाद शराब बंदी कर दी गई ! नतीजतन शराब की शौक़ीन जनता ने आयुर्वेदिक अल्कोहल का सेवन करना प्रारंभ कर दिया ! मृत संजीवनी सुरा दुकान-दुकान में मिलने लगी और इसने गाँव गाँव में भी पैठ बना ली ! यह आसानी से उपलब्ध थी ! लोग रातों रात अमीर बन गए ! परन्तु सुरा का सेवन शराब के तौर पर करना स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक सिद्ध होने लगा ! इसलिए 1987-88 के आस पास शराब फिर मिलने लगी ! इसके लिए परमिट सिस्टम लागू किया गया l शराब की लिए प्रार्थना पत्र देने के लिए एक फॉर्म भरना पढ़ता था ! एक दिन मेरे एक मित्र ने वह फ़ार्म मुझे भी दिखाया ! उस फॉर्म में कुछ मजेदार प्रश्न हुवा करते थे, जैसे शराबी का नाम, शराबी के बाप का नाम ! पर शराब पीने वालों को शराब का मजा चाहिए इसलिए वह इसको उपेक्षित कर देते थे ! और कुछ समय बाद सारे बंधन टूट गए और आज शराब दुकानों में उपलब्ध है और जनता की सहूलियत की लिए अब स्थान स्थान पर बार खुल गए है ! इधर महिलायें शराब के प्रचलन से परेशान हो शराब के खिलाफ आन्दोलन करती दीखती है ! वैसे सरकार एक ओर शराब की अधिकतम बिक्री कर अधिकतम धनराशी एकत्रित करती है वहीं सरकार के ही आबकारी विभाग मैं मद्य निषेध का कार्यालय भी होता है ! अर्थात सरकर भी असमंजस में है ! सोचती है शराब बिके तो ख़राब, और न बिके तो भी ख़राब ! सरकार दो कारणों से शराब बंदी करने के लिए राजी नहीं होती ! एक तो उन्हें तुरंत वित्त का बहुत बड़ा नुकसान होगा ! वहीं दूसरी तरफ पिछली शराब बंदी के दुष्परिणाम भी उनके सामने है ! पुराने कटु अनुभव के बावजूद पूरे देश मैं शराब बंदी का माहौल बना हुआ है ! बिहार में शराब बंदी बहुत शख्ती से लागू की गई है ! आम जन और खास तौर पर हमारी आधी आबादी महिलायें तो शराब बंदी चाहते है ! इस हेतु वह आन्दोलन कर रही हैं ! हम लोक तन्त्र में जी रहे है और लोकतंत्र में बहुमत ही निर्णायक होता है ! सरकार को अपने प्रचंड बहुमत का उपयोग महिलाओं के पक्ष में कर शीघ्र शराब बंदी लागू करनी चाहिए !

Monday, March 13, 2017

Fight out Rawat, we are with you रावत तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं !

रावत तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं ! जनतंत्र का महायुद्ध समाप्त हो चुका है ! महायुद्ध हो और महाभारत का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? प्रचंड बहुमत एवं अनगनित सेना एवं सेनानियों से लैस महा शक्तिशाली सम्राट अपने ही राज्य के एक राजा के साथ युद्ध करने के लिए अपनी सेना को पूरी रसद एवं वित्त के साथ रवाना कर चुका था और सेना बहुत दिन से राजा से युद्ध की तैयारी करने हेतु उसकी राजधानी के समीप डेरा जमाए युद्ध के लिए तत्पर थी ! पहले उसने छद्म युद्ध का सहारा लिया पर फेल हुवा, क्योंकि सत्य राजा के साथ था ! एक तरफ सम्राट का प्रचंड बहुमत और दूसरी तरफ कमजोर गठबंधन वाला राज्य ! युद्ध शुरू हुवा ! युद्ध के सारे नियम तोड़कर शाम, दाम, दंड और भेद का प्रयोग करते हुए उन्होंने अकेले राजा को खूब घुमाया ! राजा अपने राज्य में कभी उत्तर की तरफ जाता तो कभी दक्षिण की तरफ ! कभी पूरव की तरफ तो कभी पश्चिम की तरफ ! पर राजा ने हार नहीं मानी ! और वह बहादुरी से लड़ता रहा और लड़ता ही रहा ! पर यह क्या ? जनतंत्र के सारे नियम तोड़ कर खुद सम्राट भी अपनी पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में कूद पढ़े ! परन्तु राजा बहादुरी से अभिमन्यु की तरफ लड़ता लड़ता हार गया ! उसके दोनों राजमहल ध्वस्त हो गए ! उसने हार को विनम्रता एवं बहादुरी से स्वीकार किया और राजपाट सम्राट को सौंप दिया ! राजपाट सौपने के साथ ही बहादुर राजा ने कहा : यह हार हमें स्वीकार है पर बहुत शीघ्र विजय श्री के हार हमारे गले में होंगे क्योंकि ह्म तो निरंतर युद्ध करने वाले योद्धा है ! हार जीत तो हमारे लिए एक खेल है ! और आसमान जय उत्तराखण्ड के नारों के गूंज उठा ! और सम्राट छोटे छोटे राज्यों को छल बल से जीतने के लिये अपने अभियान में चल पड़ा ! राजा के 70 में से मात्र 11 किले बचे थे जिनमें से एक किला हमारे कब्जे में है ! और अब किले से ही फिर से गूजेगी युद्ध की डंकार ! यही जनतंत्र की पुकार है ! फ्रेंड्स इस जनतंत्र के महाभारत में किसकी भूमिका क्या थी यह आप समझ सकते हैं ! होली के परिपेक्ष में यह लेख डीएन बड़ोला, निदेशक उत्तराखंड आयुर्वेद यूनिवर्सिटी एवं कुमायूं मंडल विकास निगम ने लिखा है !

Saturday, February 25, 2017

उत्तराखण्ड में दो राजधानी हैं, तो दो राज्य क्यों नहीं ?















उत्तराखण्ड में दो राजधानी हैं, तो दो राज्य क्यों नहीं ?
“पहाड़ी राज हो ! कुमाउनी - गढ़वाली भाषा हो ! सब कुमाऊँनी -गढ़वाली बोलें ! गैरसैण राजधानी हो !  यही था स्वपना ! पर अफ़सोस !  नेताओं का तराई, हरिद्वार का लालच ले डूबा पहाड़ी राज को ! अब कहाँ है पहाड़ी राज ?
मेरी फेसबुक की इस पोस्ट के उत्तर में मुझे बहुत सारे कमेंट्स आये ! लोगों से उत्तर प्रत्युत्तर के पश्चात मैं आप सबकी राय जानना चाहता हूँ - क्या इन प्रश्नों का समाधान नीचे लिखे शब्दों में हो सकता है ? प्रश्न है उत्तराखण्ड में दो - दो राजधानी क्यों बनाई गई हैं ? स्पस्ट है राजनेताओं के मन मैं कहीं न कहीं मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र में राजधानी की बात होगी ! अन्यथा दो-दो राजधानी का क्या औचित्य ? क्यों केंद्र सरकार एक और राजधानी के लिए वित्त उपलब्ध करा रही है ? प्रश्न है केंद्र के मन में क्या है ? जबकि जिलों के  निर्माण  के लिए सरकार वित्त न होने का बहाना बनाती है !                                                   सरकार भी  पलायन के मुद्दे का हल चाहती है ! पलायन रोकने के लिए गैरसैंण का राजधानी बनाना अत्यंत आवश्यक एवं अनिवार्य  है !  गैरसैण राजधानी बनने से पलायन की समस्या समाप्त हो सकेगी ! उल्टा पर्वतीय अंचल को पलायन प्रारंभ हो जायेगा l  रोजगार स्रजन होगा तो लोग अपने घरों को वापस आने लगेंगे ! युवाओं की बेरोजगारी कम होगी !  पलायन रोकना इसलिए भी आवश्यकीय है क्योंकि हमारी सरहदों पर दुश्मन देश लगातार घात लगाए रहते हैं ! वर्तमान में लोग पहाड़ छोड़ रहे है, यदि लोग इसी तरह पलायन करते रहे  ! तो पहाड़ खाली हो जायेंगे और दुश्मनों की गतिविधियों का हमें पता भी नहीं चलेगा ! अतः उलटा पहाड़ों की ओर पलायन  आवश्यकीय है ! हमने एक हल  पेस किया है ! इसमें एक मत बने और कोई भी राजनैतिक दल इसे अपने अजेंडे में शामिल करे तो देर सबेर यह कार्य तो होना  ही है ! प्रश्न यह भी है कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचल का  विकास क्यों नहीं हुवा ! जब उत्तराखण्ड आन्दोलन चरम पर था मेरी वार्ता उत्तराखन्ड क्रांति के शीर्ष नेता काशी  सिंह ऐरी से हुई ! मैंने उनसे कहा हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर का मोह छोडिये ! यदि यह जिले उत्तराखण्ड में  मिलेंगे तो पर्वतीय राज्य की अवधारण ही समाप्त हो जायेगी ! उन्होंने तर्क दिया कि राज्य को आर्थिक रूप शसक्त बनाने हेतु यह आवश्यकीय है ! फिर हरिद्वार तो हरि का द्वार है ! और उधमसिंह नगर पहाड़ का आँगन ! इसलिए यह आवश्यकीय है !  मैंने कहा कि तब तो विकास हरिद्वार उधमसिंह नगर का ही होगा क्योंकि तो घर के अन्दर नहीं हो सकता ! यह तो द्वार के बाहर और आँगन में ही हो सकता है ! परन्तु वह नहीं माने ! मैंने स्वर्गीय बिपिन चंद्र त्रिपाठी से भी बात की ! त्रिपाठी मेरे साथ जीवन बीमा निगम के एजेंट के रूप मैं कार्य करते थे ! इसलिए मैंने उक्त बातें बड़े हक़ से कही ! पर उन्होंने बताया कि यह फैसला हमारे शीर्ष स्तर पर हो चुका है अतः यह संभव नहीं है ! फिर भी उन्होंने इस बात की चर्चा हेतु वायदा किया ! आज मेरी यह बात अक्षरशः सत्य हो रही है !  हरीश रावत चाहते थे कि उत्तराखण्ड केंद्र शासित राज्य बने ! जिससे कि इसकी आर्थिकी मजबूत हो सके और इसका विकास योजना बद्ध तरीके से हो सकती ! केंद्र स्तर से इसकी घोषणा की भी तैयारी हो चुकी थी ! परन्तु विभिन्न दलों के विरोध के कारण  यह नहीं हो सका ! और आज लोग उत्तराखण्ड केंद्र शासित राज्य की मांग फिर से उठा रहे हैं ! परन्तु अब पानी सर से ऊपर आ गया  है ! अब नए राज्य की मांग के विषय में समस्त पर्वतीय जनों को सोचना होगा अन्यथा अगले कुछ परिसीमानों के पश्चात हमारे विधायकों की संख्या नगण्य होती जायेगी  और हम कहीं के नहीं रहेंगे !                                                                                                              राजधानी कहाँ होगी यह प्रश्न आज 16 साल बाद भी हल नहीं हो पाया है l इसलिए इसका हल दो राज्यों के निर्माण से ही  हो सकता है ! अतः  पर्वतीय राज्य का नाम हो सकता है देवभूमि उत्तराखण्डक्योंकि देवभूमि पर्वतीय अंचल को ही कहते हैं, खास तौर पर गढ़वाल को !  मैदानी क्षेत्र को नहीं ! इसलिए मैदानी राज्य का नाम उत्तराखण्ड हो सकता है !
राजधानी गैरसैण में काफी निर्माण कार्य हो चुका है  ! 10-15 साल के लिए नया  राज्य  केंद्र शासित राज्य होना चाहिए  ! मैदानी क्षेत्र की राजधानी  देहरादून है और रहेगी ! एक सुझाव यह भी मिला था कि मैदानी इलाके को  हरित प्रदेश में शामिल  किया जाय, जिस पर जनता की राय ली जा सकती है l                                                              कुछ लोग कह रहे हैं यह सब कुछ नहीं हो सकता ! मैं इस बात को मानता हूँ ! पर यह एक विचार है ! जब विचार जन्म लेता है तो कोई न कोई उस विचार को कभी न कभी ग्रहण कर लेता है ! इसे कार्यरूप में कौन परिणित करता है, करता है भी नहीं यह समय बताएगा ? इस समय मैदानी क्षेत्र के पहाड़ी गैरसैण राजधानी के पूर्णतया  खिलाफ हैं जब कि कुमायूं के पहाड़ी क्षेत्र के लोग राजधानी देहरादून से परेशान हैं ! प्रश्न है फिर दो राजधानी क्यों बनाई गई ? स्पष्ट है एक मैदान के लिए ही और एक पहाड़ के लिए ! कब तक हम राजधानी के मुद्दे पर लड़ते रहेंगे  ? यह कटु सत्य है गैरसैण राजधानी नहीं हो सकती ! जब असाम में छोटे छोटे 7 राज्य बन सकते हैं तो उत्तराखण्ड में दो राज्य क्यों नहीं बन सकते ? अतः हमें प्रयास करना होगा !                                                                           संलग्न है गैरसैण के 22 फोटो !

डी एन बड़ोला DN Barola, रानीखेत l सम्पर्क : 9412909980

Monday, January 16, 2017

जड़ों की खोज में  BAROLA ,बडोलाबड़ोला,   – डीएन बड़ोला (DN Barola) ........1
1)उत्तराखण्ड के बडोला, बड़ोला, Barola की जड़ों की खोज  : साल 2015 में मुझे अपने पैत्रक गाँव कनरा जाने का शुभ अवसर मिला था ! हमारा गाँव 1000 वर्ष प्राचीन उन्टेश्वर महादेव मंदिर एवं  विश्व प्रसिद्द कल्याणी आश्रम डोल के लिए प्रसिद्द है l कनरा (लमगड़ा) में बुजुर्गों से बातचीत में कनरा के उन्टेश्वर महादेव मंदिर के विषय में प्रचलित किवदंती के विषय में मुझे बताया गया ! उसके अनुसार प्राचीन समय की बात है, यह शिवलिंग कनरा में प्रकट हुवा था l (इसकी पूरी कहानी कृपया पैराग्राफ 2 में देखें ) जब यह लिंग शिव जिव्हा के रूप में अवतरित हुवा, उस समय नाथ को स्वप्न में आकाशवाणी हुई कि इस शिव लिंग की पूजा या तो तू करेगा या मनु महाराज की संतान जो मानस गोत्र मैं गढ़वाल में उत्पन्न हुई है वही करेंगे ! तब मनु महाराज की संतान की खोज में 10-15 ग्रामवासियों का एक दल गढ़वाल गया l जब गढ़वाल मैं खोज की गई तो मानस गोत्र मैं उत्पन्न मनु महाराज की संतानों को खोज लिया गया ! वह दो भाई थे ! उन्होंने डोली में कनरा जाने की इच्छा प्रकट की ! श्रद्धालु ठाकुर लोगो ने डोली का इंतजाम किया और दोनों भाइयों को कनरा लाया गया  ! उसके पश्चात हरिद्वार में उन दोनों का यज्ञोपवीत कराया गया l दोनों  भाई बारी बारी से कनरा मैं शिव लिंग की पूजा करने लगे ! आज भी यह प्रथा बदस्तूर जारी है ! कनरा ग्राम में बोरा, बिष्ट, नेगी, फर्तयाल आदि जाति के लोग रहते हैं उन्हीं के सहयोग से उन्टेश्वर महादेव मंदिर के समस्त धार्मिक कार्य संपन्न होते है ! इसके अतिरिक्त ग्राम बचकांडे, स्यूनानी,पनयाली छीना, लमकोट तल्ला व मल्ला, रणाऊँ, निरई, ल्वाली आदि के ग्रामवासियों का इस सम्बन्ध मैं  सक्रिय सहयोग हमेसा ही  रहता है ! इस गाँव में बड़ोला ब्राह्मणों की एक बाखली है ! परन्तु यह स्पष्ट नहीं है कि बड़ोला लोग किस स्थान से    आये!                                                                                                                                  संजय बडोला जो पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले है उन्होंने मुझे बताया है की बडोला, बडोली से आये  हैं और वह सारे गढ़वाल और कुमाऊं मैं फ़ैल गए l  वह राजस्थान की धोलपुर स्टेट से आये l साल 2001-02 की बात है जब मैं कांग्रेस के उत्तराँचल राज्य चुनाव प्रभारी के पद पर था तथा मेरा मुख्यालय कांग्रेस कार्यालय, राजपुर रोड,  देहरादून था , तब मैंने पता लगाया था कि बडोला या बड़ोला लोग यमकेश्वर और पोखरा ब्लाक  मैं रहते हैं l चम्पावत जिले मैं भी बडोला लोग रहते हैं l संजय ने यह भी बतलाया कि चम्पावत मैं कई लोग अपने नाम में सिंह भी जोड़ते हैं l कुछ हमारे रिश्तेदार शर्मा पांडे लिखने लग गए हैं तथा मुझे पता लगा है कि कुछ बढ़िया पांडे भी लिखते हैं l इस सम्बन्ध में खोज से पता चला कि त्युरी राजवंश के राजा पृथ्वीपाल की रानी जिया थी ! इनके  राज्य में राज्य के मुख्य पंडित को बढ़ूँवा पंडित (बड़े पंडित ) की पदवी दी जाती थी ! हो सकता है इसी से प्रभावित होकर कुछ लोग स्वयं को बढ़िया पांडे लिखने लग गए हों ! असाम में बरुवा जाती पाई जाती है ! उदाहरण के अनुसार हेम कान्त बरुवा एक प्रसिद्द नाम है ! संजय के अनुसार धोलपुर स्टेट के महाराजा से बडोला लोगो को सरदार की पदवी मिली थी और वह अपने नाम मैं सिंह जोड़ देते हैं l  लेकिन वह हैं ब्राहमण l Suneel Badola  लिखते हैं हमारी आराध्य देवी हैं श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा, ‘दस महा-विद्याओमें तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । बडोली धूर में बाल कुंवारी कुलदेवी का प्राचीन मंदिर है l इसके चारों ओर बडोली गाँव बसा है l बडोली और धूर, दोनों गाँव बडोला लोगो के हैं ! बड़ी दूर दूर से आकर लोग यहाँ पर मन्नतें मांगते हैं जो कि पूरी भी होती हैं l यहाँ बकरों की बलि भी दी जाती थी l श्रद्धालुवों ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसे भव्य रूप दिया है l                                                Santosh Badola लिखते हैं  बडोली धूर का मन्दिर हमारी कुलदेवी महाकाली  का मंदिर है l इसका निर्माण हमारे पूर्वजों द्वारा किया गया था l                                                                                                            Sunil Badola के अनुसार धोलपुर के राजा ने अपने कुल पुरोहित को सिंह की उपाधि दी थी ! इस कारण कुछ लोग सिंह भी लिखते हैं ! लेकिन वह हैं ब्राह्मण ही ! परन्तु चम्पावत जिले में वह अपने को राजपूत कहते हैं l उनमें से एक श्री शेर सिंह बडोला धोलपुर महाराजा के ए०डी०सी० थे ! सुनिल कहते हैं, मैं यमकेश्वर ब्लाक पट्टी उदयपुर के ग्राम ढुंगा का  निवासी हूँ ! हमारे बजुर्गों के अनुसार हमारे पूर्वज  सन 1768 में बडोली (जोधपुर) से यमकेश्वर  आये थे l आज  यहाँ  पर लगभग 8 गाँवों में बडोला लोग बसे  हुए हैं l बडोली मैं संभवतया अजमेर राजस्थान से आये क्योंकि पट्टी उदयपुर है  !                                                           भीष्म कुकरेती जी कहते हैं इस सम्बन्ध  मैं कुछ सूचना बडोला गौड / उज्जैन  1741 बडोली उज्जवल पंथारी जलन्धर सन्दर्भ में गढ़वाल का इतिहास, जिसके लेखक थे हरिकृष्ण रत्यूड़ी जो टेहरी रियासत के प्रधान मंत्री थे, में उपलब्ध है ! वह कहते है उज्जैन मैं भी बडोला लोग रहते है तथा आपके पूर्वज धोलपुर स्टेट के बडली ग्राम से आये थे !                                                                   चन्द्र मोहन बडोला  के अनुसार जहां तक बडोला या बड़ोला की बात है कुमायूं क्षेत्र मैं ड को ड़ के रूप में उच्चारण किया जाता है l जैसे अल्मोड़ा, किल्मोड़ा, लमगड़ा को अंग्रेजी मैं Almora, Kilmora, Lamgara लिखा जाता है l इसी तरह बड़ोला को Barola लिखा जाता है अतः एक बात तो सिद्ध होती ही है कि बडोला, बड़ोला या Barola सब एक ही जाति है ! चम्पावत में बड़ोला नहीं बडेला (Badela) लिखा जाता है ! यह लोग देवीधुरा एवं भिंगरारा (Bhingrara) क्षेत्र में रहते हैं जिनका बडोला लोगो से सम्बन्ध नहीं मालूम पढ़ता l मेरी जानकारी के अनुसार उज्जैन मैं भी बडोला लोग है ! परन्तु कनरा के बड़ोला लोग ही ड के नीचे बिंदा लगते है l यह भी पता चला है कि हमारे पूर्वज धौलपुर स्टेट के बड़ली या बडली ग्राम से आये थे ! लगता है इसमें से कुछ लोग उज्जैन भी चले गए होंगे ! टेहरी स्टेट के डोजियर के अनुसार बडोला लोग ‘लड़ाकू ब्राहमण जाति’ के लोग हैं l इस बात पर मैंने संजय से कहा  कि बडोला लोग अधिकारिक एवं आक्रामक (authoratitive & aggresive) प्रवृति के तो होते ही हैं l इसलिए मुझे लगा  कि शायद बडोला या बड़ोला सब एक ही हैं l  उन्होंने यह भी बताया कि कत्युरी राजाओं के समय में ‘बडोला संघ’ भी बनाया गया जिसका काम कत्युरी राजों द्वारा नायर घाटी के आक्रमण को विफल बनाना था l उन्होंने यह भी लिखा है कि 1993 में वह श्री एसबीएस पंवार डी०ओ० उत्तर प्रदेश के संपर्क मैं आये जो कि टेहरी गढ़वाल के राज परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिनसे उन्हें यह सब जानकारी मिली l हालांकि अब श्री पंवार नहीं रहे l                                                             सुश्री रेनू प्रसाद जी के अनुसार उनके दादाजी लेफ्टिनेंट विजय राम, सर्वे ऑफ़ इंडिया मैं कार्यरत थे तथा उनके बड़े भाई लेफ्टिनेंट ज्वाला राम धोलपुर महाराज की सेवा में थे !  सन 1946 में उनकी माता श्रीमती बिमला बुदाकोटी को लेफ्टिनेंट ज्वाला राम, धोलपुर महारानी के महल में महारानी के आमंत्रण पर कन्या पूजन हेतु ले गए थे  l उस समय उनकी माता की उम्र मात्र 4-5 साल थी ! ज्ञान्तव्य हो कन्या पूजन मैं कम उम्र की कुंवारी कन्याओं को ही आमंत्रित किया जाता था l यह रिवाज आज भी प्रचलित है ! इससे स्पष्ट होता है कि बड़ोला या बडोला जाति मूल रूप से ग्राम बडली या बड़ली धौलपुर से आई l इनमें से कुछ लोग गढ़वाल मैं बस गए और कुछ लोग कुमायूं में बस गए l                                                       Bhaskar Badola  पोखरा ब्लाक में पट्टी कोलागड़ में भी 5-6 गाँव बडोला लोगों के हैं ! हमारे गाँव का नाम बडोल गाँव है !                                                                     एसडी बड़ोला: गढ़वाल में जो बडोला हैं वही बड़ोला हैं क्योंकि वे लिखते तो बडोला हैं पर उच्चारण बड़ोला ही किया जाता है l अंगरेजी मैं बड़ोला को Barola लिखा  जाता है l अपनी नई रचना में उन्होंने बडली के भैरों जी की आराधना निम्न प्रकार की है  !                                                                     हस्त पिनाक दण्ड अरिदहनम, शाश्वत काल कटारी सहितम l                  रूप कुरूप विरूप विवर्तम,    दैत्य दलन मन भाव भाषितम l                काल भैरवी तपोनिष्ठï हैं,       मृत्यु लोक पूजित रक्षित हैं l                      यमकेश्वर हितैषी (फेस बुक) बताते है : यमकेश्वर में कई गांवों में जो बडोला जाति के लोग आये थे उनके अनुसार बडोला लोगो का एक झुण्ड  1450 - 1500 ईस्वी के लगभग हिमालय में  चार धामों की यात्रा पर आया था, जो वहीं पर बस गये, तब यह जाति बड़ोली के नाम से जानी जाती  थी l वह 1550 के शीतयुग के समय  यमकेश्वर के “ढूंगा गांव” में बस गये तथा खेती बाड़ी करने के लिए और 1750 - 1800 तक ढूंगा गांव में बसते रहे l  उसके बाद कुछ परिवार वहां से आकर पौड़ी गढवाल के अन्य भागों में बिखर गये l यमकेश्वर या पौड़ी के अन्य कई हिस्सों में बडोला लोग निवास निवास करते हैं l कुछ ढूंगा गांव में, कुछ दमराड़ा गांव में, कुछ अलग अलग परिवार कई गांवों में बसे हुये हैं l उत्तराखण्ड में इनकी जन संख्या 5,000 से 10,000 तक हो सकती है ! बडोला जाति के लोगों की गिनती उच्च श्रेणी के ब्राह्मणों में की जाती है l                                                                                                                     कुछ विद्वानों से मैंने गोत्र के विषय में परामर्श किया ! सबने एक मत से कहा कि एक जाति मैं एक से ज्यादा गोत्र हो सकते हैं ! “बडली” या  “बड़ली” गाँव (धोलपुर स्टेट) को कुछ लोग बडली और कुछ लोग बड़ली कहते हैं ! इससे भी स्पष्ट होता ही कि बडोली धूर आकर कुछ लोगों ने बडोला लिखा और कुछ लोगो ने बड़ोला ! बडली या बड़ली गाँव के कुछ लोगों का गोत्र भारद्वाज और कुछ लोगों का मानस हो सकता है ! यह भी हो सकता है लोग इस गाँव को बडली कहते हों उनका गोत्र भारद्वाज हो और जो इस गाँव को बड़ली गाँव कहते हों उनका गोत्र मानस हो ! चूँकि बड़ोला को अंगरेजी मैं Barola लिखा जाता है इसलिए बडोला, बड़ोला या Barola सब एक ही जाति है ! क्रमशः ...............2
                                                                         जड़ों की खोज में – डीएन बड़ोला (DN Barola) .............2                                                               2)उन्टेश्वर महादेव मंदिर :                                                                       (उन्टेश्वर महादेव की यात्रा एवं मंदिर का व्रतांत विडियो : चन्द्र शेखर बड़ोला 17.4.2015 ) लिंक :    https://www.youtube.com/watch?v=X_GfqH8ZUQg                कनरा गाँव 1000 वर्ष प्राचीन उन्टेश्वर महादेव मंदिर एवं  विश्व प्रसिद्द कल्याणी आश्रम डोल के लिए प्रसिद्द है l  चन्द राजाओं के राज्य काल मैं स्थापित एवं पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित 1,000 वर्ष पुराना ऊन्टेश्वर महादेव मंदिर, शिव-जिव्हा के रूप मैं स्थापित है ! यह देवाधिदेव महादेव का ही चमत्कार है कि इस शिव लिंग मैं जो भी जल अर्पित किया जाता है वह अलोप हो जाता है ! शिव रात्रि के दिन यहाँ पर एक बड़ा धार्मिक महोत्सव होता है ! यह मेरा पैत्रक निवास है ! बड़ोला या Barola लोगों की उन्टेश्वर महादेव पर अपार श्रद्धा है ! उन्टेश्वर महादेव के सम्बन्ध मैं एक प्राचीन कहानी है ! कहते है कि जब कभी भी प्राकृतिक संपदाओं का आवश्यकता से अधिक दोहन  हो जाता है तो प्रथ्वी वासियों की समस्याएँ भी बढ़ने लगती है ! तब देवाधिदेव महादेव अवतरित होते हैं l यह प्रकृति चक्र है ! इसी कारण से उन्टेश्वर महादेव कनरा मैं प्रकट हुए ! प्राचीन कथा के अनुसार जब देवता एवं राक्षस प्रथ्वी से बहुत अधिक मात्रा में रिद्धि सिद्धि का दोहन करने लगे तब माँ पृथ्वी  के पास मदद के लिए पहुँची l ब्रह्मा ने उन्हें भगवान् विष्णु एवं महादेव के पास भेजा l त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ने उनकी समस्या को समझा l तब एक आकाशवाणी हुई l आकाशवाणी में कहा गया कि जब ब्रह्मदेव का सर ब्रह्म-कपाली मैं गिरेगा ठीक तब ही महादेव दर्शन देंगे तथा अनेक स्थानों पर शिव लिंगों का प्रादुर्भाव होगा l उस समय पृथ्वी की समस्त समस्यों का समाधान होगा और पृथ्वी को शांति मिलेगी और महादेव उन्हें दर्शन देंगे l मान्यता के अनुसार जब महादेव ने झांकर पहाड़ी में दर्शन दिए तब ही अनेक स्थानों मैं शिव लिंगों का अवतरण हुवा l उनमें से एक शिवलिंग ‘उन्टेश्वर महादेव’ शिव जिव्हा के रूप में कनरा में अवतरित हुए !    लिंक :                                                                                                     https://www.youtube.com/watch?v=sw-KkuCV6nw                                                              (उन्टेश्वर महादेव मंदिर का व्रतांत विडियो : चन्द्र शेखर बड़ोला 22.4.2015)    कनरा के शिव लिंग के विषय में एक किवदंती है ! चंद शासकों के समय में रिंगाल की झाड़ियाँ गाँव के बाहर बहुत मात्रा में फ़ैली हुई थी ! रिंगाल से ग्रामवासी नाना प्रकार की वस्तु बनाते थे ! एक समय की बात है एक ग्रामवासी ने अपनी हँसियाँ को धार देने के लिए एक पत्थर से घिसा l अचानक पत्थर में से खून की धारा बहने लगी l ग्रामीण भयभीत हो चिल्लाते हुए वहाँ से भागा पर रास्ते में शेर ने उसको अपना निवाला बना डाला l बाद में ग्रामवासियों ने शिवलिंग को विधिवत स्थापित कर उसकी पूजा करना प्रारम्भ कर दी l शिव लिंग मैं हँसियाँ का निशान आज भी विद्वमान है ! इस लिंग की लम्बाई जमीन से ऊपर 7 फीट है और बांकी लिंग प्रथ्वी के अन्दर है l प्रारंभ में  ही  ग्रामीणों ने इस लिंग की लम्बाई जानने हेतु इसकी खुदाई की पर इसका पारावार नहीं मिल पाया और खुदाई बंद करनी पड़ी l इस शिव लिंग के पास ही पंचमुखी गणेश की मूर्ती विराजमान है l यहां पर अक्सर सांप दिखाई देते है जो कि महादेव के गले के हार माने जाते हैं ! शिव मंदिर का निर्माण चंद राजाओं ने किया तथा यहाँ पर सूर्य एवं दुर्गा के कुछ मंदिर भी हैं l उन्टेश्वर महादेव मंदिर इस इलाके का अति प्राचीन मंदिर है l ग्रामीणों के अनुसार अनावृष्टि के कारण 1990 मैं भयंकर अकाल पड़ा l ग्रामीणों ने शिवलिंग मैं सैकड़ों गागर जल अर्पित किया l जितना भी जल शिव जिव्हा में अर्पित किया गया वह सब अलोप हो गया l जल अर्पित किये जाने के पश्चात महादेव प्रसन्न हुए और गाँव मैं जम कर वर्षा हुई जिससे ग्राम वासियों ने राहत की सांस ली l                                                                     सन्तान प्राप्ति : शिव रात्रि को एक बड़े मेले का हर वर्ष आयोजन किया जाता है ! उसमें दूर दूर के श्रद्धालु भाग लेते हैं l रात्रि मैं चार प्रहर की पूजा, जागरण एवं अखण्ड कीर्तन एवं महादेव का रुद्राभिषेख किया जाता है l संतान प्राप्ति के इच्छुक दम्पति अटूट श्रद्धा से इस मंदिर में आते हैं l भोले नाथ उनको निराश नहीं करते ! इस हेतु दम्पति को 12 घंटे की तपस्या पूरी करनी होती है ! शाम 6 बजे से प्रातः 6 बजे तक दम्पति शक्ति की अराधना करते है l स्त्री खड़ी होकर “नमः शिवाय” का पाठ करती है जबकि पुरुष के खड़े होकर “ॐ नमः शिवाय” का पाठ करने का विधान है l  इसमें महिला के हाथ 12 घंटे दीपक लगातार जलता  रहता है ! इस अवधि में दीपक की लौ नहीं   बुझनी चाहिए अन्यथा यह अपशकुन माना जाता है ! यदि महादेव दम्पति की इच्छा पूर्ण नहीं करना चाहते तो स्त्री को  उल्टी या चक्कर आ जाता है l          रोट का प्रसाद : “वैसाखी पूर्णिमा के दिन गेहूं की नई फसल की  कटाई के समय भोलेनाथ को रोट का भोग लगाया जाता है एवं श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है !                                                                                                                                            उन्टेश्वर महादेव मन्दिर अल्मोड़ा से 43 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है l अल्मोड़ा से लमगड़ा फिर चायखान-थुवासिमल रोड सड़क से कनरा आराम से पहुंचा जा सकता है l चायखान से 3 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम कनरा के अंतर्गत ही विश्व प्रसिद्द कल्याणी आश्रम है ! कनरा की बासमती प्रसिद्द है तथा यहाँ पर मडुवा व झूंगरा व अन्य अनाज होता है जिसकी अब काफी मांग है !  क्रमशः ...............3

जड़ों की खोज में – डीएन बड़ोला (DN Barola) ..............3                                                              3)बड़ली या बडली के भैरूमंदिर जोधपुर राजस्थान lhttps://www.facebook.com/DevalayaParichay/posts/905980509474366:0                                                                                                                                                       जोधपुर शहर से 13 किलोमीटर दूर जोधपुर-जैसलमेर मार्ग पर बडली/बड़ली गॉंव में स्थित बड़ली के भैरूमंदिर नाम से विख्यात यह मंदिर 700 वर्ष पुराना है। इस मंदिर का निर्माण मारवाड़ के नरेश राव सीहाजी ने करवाया था, जो पूरे राजस्थान में विख्यात है। बड़ली के भैरूजी की काले पत्थर से निर्मित आदमकद प्रतिमा है, जिसके पास तीन छोटी और प्रतिमाएँ हैं। मूर्तियॉं एक चबूतरे पर विराजमान हैं। मंदिर के पीछे विशाल तालाब के पीछे पुरोहितों की कुलदेवी विशौतरी माता का मंदिर है। मंदिर के निर्माण की कहानी कुछ इस प्रकार है। रावसिहाजी जोधपुर के साथ कन्नौज के भी शासक थे । इन्होंने मारवाड़ से बाहर रहकर 13 वर्ष तक कन्नौज पर भी शासन किया था। वे प्रायः मारवाड़ भी आते रहते थे । एक बार जब वे कन्नौज से अपने वफादारों व राज पुरोहितों के साथ मारवाड़ लौट रहे थे, तभी मुल्तान की तरफ से मुगलों ने मारवाड़ पर आक्रमण कर दिया। राव सीहाजी उस समय द्वारिका जा रहे थे, लेकिन युद्ध की विभीषिका देखकर वे स्वयं वहॉं नहीं जा पाये और अपने राज पुरोहितों को काशी भेजकर भैरूजीकी मूर्ति लाने की आज्ञा देकर स्वयं आक्रमणकारियों पर दलबल समेत टूट पड़े और मुगलों को परास्त किया l इधर जब राज पुरोहित राव सीहाजी के इष्टदेव के रूप में काले पत्थर की भैरूजीकी मूर्ति लेकर मारवाड़ लौटे तो उस समय राव सीहाजी पाली में डेरा डाले हुए थे । कुछ दिन बाद राज पुरोहितों के साथ भीनमाल व खेड़ होते हुए जोधपुर पहुँचे तो सीमा में प्रवेश के दौरान इन्हें एक हराभरा क्षेत्र व पानी का विशाल तालाब दिखाई दिया, जहॉं बड़ (बरगद) का एक विशाल वृक्ष था। राव सीहाजी अपने लाव-लश्कर समेत यहीं ठहर गये और तालाब के किनारे भैरूजी की प्रतिमा प्रतिष्ठापित करने का मन बनाया। राज पुरोहितों के सहयोग से विधिवत् पूजा-अर्चना के बाद अपने इष्टदेव भैरूजी को यहॉं स्थापित कर दिया। धीरे-धीरे भैरूजी की ख्याति जनमानस में फैलने लगी तो ग्रामीणोंने भारी भरकम बड़ के पेड़ के नाम से ही इस स्थान का नाम बड़लीरख दिया व कालांतर में यह मंदिर बड़लीया बडली के भैरूके नाम से विख्यात हो गया।  समूचे राजस्थान के अलावा गुजरात व मध्य-प्रदेश तथा महाराष्ट्र के भी श्रद्धालु मनोवांछित आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु आते हैं। अनेक श्रद्धालुजन पुत्र-प्राप्ति की इच्छा रख के आते हैं, और भैरुजी उसे पूरा करते है। इस संबंध में मंदिर के पुजारी बताते हैं कि एक दफा एक हिजड़े ने भी भैरूजी के दर्शन कर परीक्षा के लिए संतान प्राप्ति का वर मांग लिया । संयोग से हिजड़े की मनोकामना पूर्ण हो गई और उसे गर्भाधारण हो गया। बाद में जब हिजड़े को अपनी नपुंसकता का आभास हुआ तो उसे शर्म महसूस हुई। अतः लोकलाज के भय से उसने यहीं आकर भैरूजी से क्षमा मॉंग ली व बाद में उसका गर्भपात हो गया। इसी हिजड़े ने यहॉं एक सॉल (शेड) का निर्माण करवाया, जो आज भी मंदिर के दायीं ओर बनी हुई है, जहॉं श्रद्धालु ठहरते हैं।  भैरूजी को प्रसाद के रूप में शराबव मीठे का भोग ही चढ़ता है, लेकिन प्रसाद सीमा से बाहर न ले जाने की परंपरा भी है। इसलिए सभी श्रद्धालु प्रसाद यहीं वितरित कर देते हैं। मंदिर से जाते वक्त श्रद्धालु मंदिर में चींण (धागा) बॉंध कर फिर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। भैरूजी की पूजा के साथ यहॉं बड़ को पूजने की भी रीति है। भैरूजी के मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद की शुक्ल पक्ष में तेरस, चौदस व पूर्णिमा के रोज भारी मेला लगता है। हर तीन साल में अधिक मास पर यहॉं भौगिशैल परिक्रमा का मेला भी लगता है, जिसमें राजस्थान के दूरदराज क्षेत्रों से भारी तादाद में श्रद्धालु आते हैं ।                                           हमने जो जानकारी इकठ्ठा की उसके अनुसार बर्ली (Barli) के पास ग्राम बड़ली मैं भेरू जी का मंदिर है तथा वहां पर एक तालाब  भी है ! कुछ लोग इस स्थान को बडली लिखते हैं और कुछ बड़ली ! यहाँ भैरब जी के कई मंदिर हैं ! मंदिरों की एक लम्बी श्रृंखला के तहत प्रबल जनास्था का मंदिर जोधपुर शहर से 13 किलोमीटर दूर जोधपुर-जैसलमेर मार्ग पर बड़ली गॉंव में है। लगता है गढ़वाल के ग्राम बडोली धूर  आने पर ‘बड़ली’ या ‘बडली’ ग्राम का अपभ्रंश बडोली धूर बना हो !  गाँव के नाम पर ही गढ़वाल के लोगों ने बडोला और जब यही लोग कुमायूं की तरफ आये तो बड़ली के बजाय बड़ोला सरनेम  लिखना प्रारंभ कर दिया हो ! इस खोज से एक बात तो स्पष्ट है बडोला, बड़ोला या Barola सब एक ही है ! बड़ली ग्राम के इस मंदिर का विडियो का लिंक  है  : https://www.youtube.com/watch?v=BMq5ilOleF4                                                     अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें : https://www.google.com/maps/place/Barli,+Rajasthan,+India/@26.3130927,72.9234051,15z/data=!3m1!4b1!4m5!3m4!1s0x39418fda22803d6b:0xa406c69634136e42!8m2!3d26.3133735!4d72.9312921?hl=en-US                   उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है बडोला या बड़ोला या Barola लोग बडली या बड़ली (जोधपुर) राजस्थान  से आये थे ! कुछ लोग यमकेश्वर ब्लाक मैं बडोला जाति बनकर ढूंगा गांव व कुछ अन्य गाँवों में तथा कुछ लोग पौड़ी के “बडोली धूर” में और कुछ कुमाऊं के कनरा (अल्मोड़ा) बसते रहे l लेख के अंत में प्रस्तुत है एक लघु कविता ! लेखक हैं लखनऊ से पत्रकार एवं साहित्यकार एसडी बड़ोला (षष्टी द्वादस ) - विहंगम संगम                                                       
कब से देखा सपना देखा,   अपनों का हो लेखा जोखा
कनरा और बडोली धुर में,   ऊंटेश्वर का मंदिर देखा
देखो सारे ग्रन्थ खुले हैं,     कहां कहां ये फूल खिले हैं
कहो बड़ोला, कहो बडोला,    ये तो सारे तार मिले हैं।                                                                      लगता सारे पाप धुल गये,   सारे अपने आप धुल गये                                   यह लेख मैं अपने अनेक सहयोगियों के साथ देवाधिदेव महादेव हमारे कुल देवता उन्टेश्वर महादेव की कृपा एवं  की प्रेरणा से ही लिखा होगा, ऐसा मेरा प्रबल विश्वास है ! परन्तु यह श्रंखला खोज हेतु जारी रहेगी l  क्रमशः ...............4                                                                                
फोटो विवरण : 1 – लेखक डीएन बड़ोला; 2 से 12 तक उन्टेश्वर महादेव मंदिर ;13 – डोल आश्रम ग्राम कनरा ;14, 15, 16,17 बडोली धूर;   18 व 19 बडोली;              20 से 24 बडली या बड़ली (जोधपुर) के भैरूं मंदिर की झलकियाँ;                                                        
लेखक ! देवकी नन्दन बड़ोला, डीएन बड़ोला (DN Barola)                                                               बड़ोला काटेज, रानीखेत l    संपर्क : 9412909980,   dnbarola@yahoo.co.in                                                 सहयोग : संजय बडोला, सुनील बडोला, भीष्म कुकरेती, चन्द्र मोहन बडोला,  सुश्री रेनू प्रसाद, एसडी बडोला, यमकेश्वर हितैसी आदि !                                                         
विशेष सहयोग !  चन्द्र शेखर बड़ोला, पंडित खीमा नन्द बड़ोला, श्रीमती उदा बड़ोला, लीलाधर बड़ोला, श्रीमती प्रेमा पांडे आदि !                                   


























समर्पित : पूज्य बाब्जी (पिता ) पंडित मोती राम बड़ोला एवं ईजा श्रीमती पार्वती देवी !